चौदहवें समुल्लास

अनुभूमिका (४)

जो यह १४ चौदहवां समुल्लास मुसलमानों के मतविषय में लिखा है सो केवल क़ुरान के अभिप्राय से; अन्य ग्रन्थ के मत से नहीं; क्योंकि मुसलमान क़ुरान पर ही पूरा-पूरा विश्वास रखते हैं। यद्यपि फ़िरके होने का कारण किसी शब्द, अर्थ आदि विषय में विरुद्ध बात है तथाऽपि क़ुरान पर सब ऐकमत्य हैं।

जो क़ुरान अर्बी भाषा में है, उस पर मौलवियों ने उर्दू में अर्थ लिखा है। उस अर्थ का देवनागरी अक्षर और आर्य्यभाषान्तर कराके पश्चात् अर्बी के बड़े-बड़े विद्वानों से शुद्ध करवाके लिखा गया है। यदि कोई कहे कि यह अर्थ ठीक नहीं है, तो उसको उचित है कि मौलवी साहबों के तर्जुमाओं का पहिले खण्डन करे, पश्चात् इस विषय पर लिखे। क्योंकि यह लेख केवल मुनष्यों की उन्नति, सत्याऽसत्य के निर्णय के लिये सब मतों के विषयों का थोड़ा-थोड़ा ज्ञान होवे, इससे मनुष्यों को परस्पर विचार करने का समय मिले और एक-दूसरे के दोषों का खण्डन कर गुणों का ग्रहण करें। न किसी अन्य मत पर, न इस मत पर झूठ-मूठ बुराई वा भलाई लगाने का प्रयोजन है किन्तु जो-जो भलाई है, वही भलाई और जो बुराई है, वही बुराई सबको विदित होवे। न कोई किसी पर झूठ चला सके और न सत्य को रोक सके। और सत्यासत्य विषय प्रकाशित किये पर भी जिसकी इच्छा हो, वह न माने, वा माने, किसी पर बलात्कार नहीं किया जाता।

और यही सज्जनों की रीति है कि अपने वा पराये दोषों को दोष और गुणों को गुण जानकर, गुणों का ग्रहण और दोषों का त्याग करें और हठियों का हठ दुराग्रह न्यून करें-करावें। क्योंकि पक्षपात से क्या-क्या अनर्थ जगत् में न हुए और न होते हैं। सच तो यह है कि इस अनिश्चित क्षणभङ्ग जीवन में पराई हानि करके लाभ से स्वयं रिक्त रहना और अन्य को रखना मनुष्यपन से बहिः है।

इसमें जो कुछ विरुद्ध लिखा गया हो, उसको सज्जन लोग विदित कर देंगे। तत्पश्चात् जो उचित होगा तो माना जायगा, क्योंकि यह लेख हठ, दुराग्रह, ईर्ष्या, द्वेष, वाद-विवाद और विरोध घटाने के लिये किया गया है, न कि इनको बढ़ाने के अर्थ। क्योंकि एक-दूसरे की हानि करने से पृथक् रह परस्पर को लाभ पहुँचाना, हमारा मुख्य कर्म है। अब यह १४ चौदहवें समुल्लास में मुसलमानों का मतविषय सब सज्जनों के सामने निवेदन करता हूँ। विचार कर, इष्ट का ग्रहण, अनिष्ट का परित्याग कीजिये।

 

अलमतिविस्तरेण बुद्धिमद्वर्य्येषु।

इत्यनुभूमिका॥

 

ओ३म्

अथ चतुर्दशसमुल्लासारम्भः

अथ यवनमतविषयं व्याख्यास्यामः

इसके आगे मुसलमानों के मत-विषय में लिखेंगे—

१. आरंभ साथ नाम अल्लाह के। क्षमा करने वाला दयालु॥

—मंजिल १। सिपारा १। सूरत १॥

समीक्षक—मुसलमान लोग ऐसा कहते हैं कि ‘यह क़ुरानर्ि ख़ुदा का कहा है’, परन्तु इस वचन से विदित होता है कि इसका बनानेवाला कोई दूसरा है, क्योंकि जो परमेश्वर का बनाया होता तो “आरम्भ साथ नाम अल्लाह के” ऐसा न कहता किन्तु “आरम्भ वास्ते उपदेश मनुष्यों के” ऐसा कहता। यदि मनुष्यों को शिक्षा करता है कि तुम ऐसा कहो तो भी ठीक नहीं, क्योंकि इससे पाप का आरम्भ भी ख़ुदा के नाम से होकर उसका नाम भी दूषित हो जायगा।

जो वह क्षमा और दया करनेहारा है तो उसने अपनी सृष्टि में मनुष्यों के सुख़ार्थ अन्य प्राणियों को मार, दारुण पीड़ा दिलाकर, मरवाके माँस खाने की आज्ञा क्यों दी? क्या वे प्राणी अनपराधी और परमेश्वर के बनाये हुए नहीं हैं?

और यह भी कहना था कि “मैं परमेश्वर के नाम पर अच्छी बातों का आरम्भ करता हूँ, बुरी बातों का नहीं”। इस कथन में गोलमाल है। क्या चोरी, जारी, मिथ्या-भाषणादि, अधर्म का भी आरम्भ परमेश्वर के नाम पर किया जाय? इसी से देख लो, कसाई आदि मुसलमान, गाय आदि के गले काटने में भी ‘बिस्मिल्लाह’ इस वचन को पढ़ते हैं; जो यही इसका पूर्वोक्त अर्थ है तो बुराइयों का आरम्भ भी परमेश्वर के नाम पर मुसलमान करते हैं और मुसलमानों का ‘ख़ुदा’ दयालु भी न रहेगा, क्योंकि उसकी दया उन पशुओं पर न रही। और जो मुसलमान लोग इसका अर्थ नहीं जानते तो इस वचन का प्रकट होना व्यर्थ है। यदि मुसलमान लोग इसका अर्थ उलटा करते हैं तो सूधा अर्थ क्या है? इत्यादि॥१॥

२. सब स्तुति परमेश्वर के वास्ते है जो परवरदिगार अर्थात् पालने हारा है सब संसार का॥ क्षमा करने वाला दयालु है॥

—मं॰ १। सि॰ १। सूरतुल्फातिहा आयत १।२॥

समीक्षक—जो क़ुरान का ख़ुदा संसार का पालनेहारा होता और सबपर क्षमा और दया करता होता, तो अन्य मत वाले और पशु आदि को भी मुसलमानों के हाथ से मरवाने का हुक्म न देता। जो क्षमा करनेहारा है तो क्या पापियों पर भी क्षमा करेगा? और जो वैसा है तो आगे लिखेंगे कि “काफ़िरों का क़त्ल करो” अर्थात् जो क़ुरान और पैग़म्बर को न मानें वे काफ़िर हैं, ऐसा क्यों कहता? इसलिये क़ुरान ईश्वरकृत नहीं दीखता॥२॥

३. मालिक दिन न्याय का॥ तुझ ही की हम भक्ति करते हैं और तुझ ही से सहाय चाहते हैं॥ दिखा हमको सीधा रास्ता॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ १। आ॰ ३।४।५॥

समीक्षक—क्या ख़ुदा नित्य न्याय नहीं करता? किसी एक दिन न्याय करता है? इससे तो अँधेर विदित होता है। उसी की भक्ति करना और उसी से सहाय चाहना तो ठीक है, परन्तु क्या बुरी बात का भी सहाय चाहना? और सूधा मार्ग एक मुसलमानों ही का है वा दूसरे का भी? सूधेमार्ग को मुसलमान क्यों नहीं ग्रहण करते? क्या सीधा रास्ता बुराई की ओर का तो नहीं चाहते? यदि भलाई सबकी एक है, तो फिर मुसलमानों ही में विशेष कुछ भी न रहा और जो दूसरों की भलाई नहीं मानते, तो पक्षपाती हैं॥३॥

४. [दिखा] उन लोगों का रास्ता कि जिनपर तूने ऩिआमत अर्थात् ऐश्वर्य दोनों लोक का वा अत्यन्त दया की॥ और उनका मार्ग मत दिखा कि जिनके ऊपर तूने गज़ब अर्थात् अत्यन्त क्रोध की दृष्टि की और न गुमराहों का मार्ग हमको दिखा॥                          —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ १। आ॰ ६।७॥

समीक्षक—जब मुसलमान लोग पूर्वजन्म और पूर्वकृत पाप-पुण्य नहीं मानते तो किन्हीं को दोनों लोकों के ऐश्वर्य देने और किन्हीं को न देने से ख़ुदा पक्षपाती हो जायगा, क्योंकि विना पाप-पुण्य के सुख-दुःख देना केवल अन्याय की बात है। और विना कारण किसी पर दया और किसी पर क्रोधदृष्टि करना भी ख़ुदा के स्वभाव से बहिः है। क्योंकि विना भलाई-बुराई के वह दया अथवा क्रोध नहीं कर सकता और जब उनके पूर्व सञ्चित पुण्य-पाप ही नहीं, तो किसी पर दया और किसी पर क्रोध करना नहीं हो सकता॥

और जो ‘गुमराह’ शब्द का अर्थ नोट में काफिर, बेदीन (जो मुसलमान नहीं है) यह लिखा है तो वह ख़ुदा केवल मुसलमानों ही का पक्षपाती होगा, अन्य का नहीं। क्योंकि जो सब मत-मतान्तरों में धर्मात्मा और पापात्मा होते हैं, तो धर्मात्मा भी इस लेख से काफ़िर हो सकते हैं और जो मुसलमानों में बुरे काम करते हैं, क्या वे काफ़िर नहीं हैं? और जो काफ़िर हैं, वे सब मतों में बुरे हैं और जो धर्मात्मा हैं, वे सब मतों में उत्तम हैं, तो मुसलमानों से भिन्न मनुष्यों को काफ़िर कहना अविद्या की बात है।

और इस सिपारे और इस सूरे की टिप्पन पर—“यह सूरः अल्लाह साहेब ने मनुष्यों के मुख से कहलाई कि सदा इस प्रकार से कहा करें”, जो यह बात है तो ‘अलिफ्, बे’ आदि अक्षर भी ख़ुदा ही ने पढ़ाये होंगे। जो कहो कि [नहीं, तो] विना अक्षरज्ञान के इस सूरः को कैसे पढ़ सके? क्या कण्ठ ही से बुलाए और बोलते गये? जो ऐसा है तो सब क़ुरान ही कण्ठ से पढ़ाया होगा।

इससे ऐसा समझना चाहिये कि जिस पुस्तक में पक्षपात की बातें पाई जायें, वह पुस्तक ईश्वरकृत नहीं हो सकता। जैसा कि अरबी भाषा में उतारने से अरबवालों को तो इसका पढ़ना सुगम, अन्य भाषाओं को बोलने वालों को कठिन होता है, इसी से ख़ुदा में पक्षपात आता है। और जैसे परमेश्वर ने सृष्टिस्थ सब देशस्थ मनुष्यों पर न्यायदृष्टि से सब देशभाषाओं से विलक्षण संस्कृत-भाषा कि जो सब देशवालों के लिये एक से परिश्रम से विदित होती है, उसी में वेदों का प्रकाश किया है, करता तो कुछ भी दोष न होता॥४॥

५. यह पुस्तक कि जिसमें सन्देह नहीं, परहेज़गारों को मार्ग दिखलाती है॥ जो कि ईमान लाते, साथ ग़ैब (परोक्ष) के और नमाज़ पढ़ते, और उस वस्तु से जो हमने उनको दी, खर्च करते हैं और वे लोग जो उस किताब पर ईमान लाते हैं जो तेरी ओर वा तुझसे पहिले उतारी गई, और विश्वास क़यामत पर रखते हैं॥ ये लोग अपने मालिक की शिक्षा पर हैं और ये ही छुटकारा पानेवाले हैं॥ निश्चय जो काफ़िर हुए और उन पर तेरा डराना, न डराना समान है, वे कभी ईमान न लावेंगे॥ अल्लाह ने उनके दिलों, कानों पर मोहर कर दी और उनकी आंखों पर पर्दा है और उनके वास्ते बड़ा अज़ाब है॥      —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ २।३।४।५।६।७॥

समीक्षक—क्या अपने ही मुख से अपनी किताब की प्रशंसा करना ख़ुदा की दम्भ की बात नहीं? जब ‘परहेज़गार’ अर्थात् धार्मिक लोग हैं वे तो स्वतः सच्चे मार्ग में हैं, और जो झूठे मार्ग पर हैं, उनको यह क़ुरान मार्ग ही नहीं दिखला सकता, फिर किस काम का रहा?

क्या पाप पुण्य और पुरुषार्थ के विना ख़ुदा अपने ही ख़जाने से खर्च करने को देता है? जो देता है तो सबको क्यों नहीं देता? और मुसलमान लोग परिश्रम क्यों करते हैं?

और जो बाइबल इञ्जील आदि पर विश्वास करना योग्य है तो मुसलमान इञ्जील आदि पर ईमान जैसा क़ुरान पर है, वैसा क्यों नहीं लाते? और जो लाते हैं तो क़ुरान का होना किसलिये? जो कहें कि क़ुरान में अधिक बातें हैं, तो पहिली किताब में लिखना ख़ुदा भूल गया होगा! और जो नहीं भूला तो क़ुरान का बनाना निष्प्रयोजन है। और हम देखते हैं तो बायबिल और क़ुरान की बातें कोई-कोई न मिलती होंगी, नहीं तो सब मिलती हैं। एक ही पुस्तक जैसा कि वेद है क्यों न बनाया? क्या क़यामत पर ही विश्वास रखना चाहिये अन्य पर नहीं?॥

क्या ईसाई और मुसलमान ही ख़ुदा की शिक्षा पर हैं, उनमें कोई भी पापी नहीं हैं? क्या जो ईसाई और मुसलमान अधर्मी हैं, वे भी छुटकारा पावें और दूसरे धर्मात्मा भी न पावें, तो बड़े अन्याय, अन्धेर की बात नहीं है?॥

और क्या जो लोग मुसलमानी मत को न मानें, उन्हीं को क़ाफिर कहना वह एकतर्फ़ी डिगरी नहीं है?॥

जो परमेश्वर ही ने उनके अन्तःकरण और कानों पर मोहर लगाई और उसी से वे पाप करते हैं, तो उनका कुछ भी दोष नहीं। यह दोष ख़ुदा ही का है, फिर उन पर सुख-दुःख वा पाप-पुण्य नहीं हो सकता, पुनः उनको सज़ा जज़ा क्यों करता है? क्योंकि उन्होंने पाप वा पुण्य स्वतन्त्रता से नहीं किया॥५॥

६. वे अल्लाह और ईमानदारों को फरेब देते हैं।। उनके दिलों में रोग है, अल्लाह ने उनको रोग बढ़ा दिया॥      —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ९।१०॥

समीक्षक—क्या ईश्वर से किसी का कपट, छल अज्ञात रहता है? यदि रहता है तो वह खुदा ही नहीं। इससे ऐसा लिखना ही व्यर्थ है। भला परमेश्वर को कौन भरमा सकता है और जो भ्रमाने से बहक जाता है, वह ईश्वर ही नहीं हो सकता। क्यों विना अपराध खुदा ने उनको रोग बढ़ाया, दया न आई, उन बिचारों को बड़ा दुःख हुआ होगा! क्या यह शैतान से बढ़कर शैतानपन का काम नहीं है? किसी के मन पर ताला लगाना, किसी को रोग बढ़ाना, खुदा का काम नहीं हो सकता। क्योंकि रोग का बढ़ना अपने पापों से है॥६॥

७. उनसे अल्लाह ठट्ठा करता है॥ जिसने तुम्हारे वास्ते पृथिवी बिछौना और आसमान की छत को बनाया॥   —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ १४।२१॥

समीक्षक—जब किसी का ठट्ठा करना, उत्तम पुरुष का काम नहीं, तो खुदा को ठट्ठा करना योग्य कभी नहीं हो सकता, और जो ठट्ठेबाज़ है, वह खुदा ही नहीं।। भला, आसमान छत किसी की हो सकती है? यह अविद्या की बात है। आकाश को छत के समान मानना हांसी की बात है। यदि किसी प्रकार की पृथिवी को आसमान मानते हों तो उनकी घर की बात है॥७॥

८. जो तुम उस वस्तु से सन्देह में हो जो हमने पैग़म्बर के ऊपर उतारी, तो उस कैसी एक सूरत ले आओ और अपने को पुकारो, अल्लाह के विना जो तुम सच्चे हो॥ जो तुम न करो और कभी न करोगे, तो उस आग से डरो कि जिसका इन्धन मनुष्य है और काफ़िरों के वास्ते पत्थर तैयार किये गये हैं॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ २३, २४॥

समीक्षक—भला, यह कोई बात है कि उसके सदृश कोई सूरत न बने? क्या अकबर बादशाह के समय में मौलवी फ़ैजी ने विना नुक़ता का क़ुरान नहीं बना लिया था?

और वह कौन सी आग जो दोजख की है? क्या इस आग से न डरना चाहिए? इसका भी इन्धन जो कुछ पड़े सब है। क्या जैसे क़ुरान में लिखा है कि काफ़िरों के वास्ते पत्थर तैयार किये गये हैं, तो पुराणों में लिखा है म्लेच्छों के लिए घोर नरक बना है! अब कहिये किसकी बात सच्ची मानी जाय?

अपने-अपने वचन से दोनों स्वर्गगामी और दूसरे के मत से दोनों नरकगामी होते हैं, इसलिए यह सबका झगड़ा झूठा है, किन्तु जो धार्मिक हैं वे सुख, और जो पापी हैं, वे सब मतों में दुःख पावेंगे॥८॥

९. और तू ईमानवालों को आनन्द का सन्देसा दे कि उनके वास्ते बहिश्तें हैं जिन में चलती हैं नहरें, जब उसमें से मेवों के भोजन दिये जावेंगे तब कहेंगे कि यह वो वस्तु हैं जो हम पहिले इससे दिये गये थे; निश्चय और उनके लिए पवित्र बीवियाँ हैं, सदैव वहाँ रहने वाली हैं॥ —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ २५॥

समीक्षक—भला! यह क़ुरान का बहिश्त संसार से कौन सी उत्तम बातवाला है? क्योंकि जो पदार्थ संसार में हैं, वे ही मुसलमानों के स्वर्ग में हैं। और इतना विशेष है कि यहाँ जैसे पुरुष जन्मते-मरते और आते-जाते हैं, उसी प्रकार स्वर्ग में नहीं। किन्तु यहाँ की स्त्रियाँ सदा नहीं रहतीं और वहाँ ‘बीवियाँ’ अर्थात् उत्तम स्त्रियाँ सदा काल रहती हैं तो जबतक कयामत की रात न आवेगी, तबतक उन बिचारियों के दिन कैसे कटते होंगे?

हाँ, जो खुदा की उन पर कृपा होती होगी! और खुदा ही के आश्रय समय काटती होंगी तो ठीक है! क्योंकि यह मुसलमानों का स्वर्ग गोकुलिये गुसांइयों के गोलोक और मन्दिर के सदृश दीखता है। क्योंकि वहाँ स्त्रियों का मान्य बहुत, पुरुषों का नहीं, वैसे ही खुदा के घर में भी स्त्रियों का मान्य अधिक और उनपर खुदा का प्रेम भी बहुत है, उतना पुरुषों पर नहीं। क्योंकि बीवियों को खुदा ने बहिश्त में सदा रक्खा और पुरुषों को नहीं, वे बीवियाँ विना ख़ुदा की मर्ज़ी स्वर्ग में कैसे ठहर सकतीं? जो यह बात ऐसी ही हो, तो ख़ुदा स्त्रियों में फस जाय॥९॥

१०. आदम को सारे नाम सिखाये, फिर फ़रिश्तों के सामने करके कहा—जो तुम सच्चे हो मुझे उनके नाम बताओ॥ फिर कहा हे आदम! उनको उनके नाम बता दे, तब उसने बता दिये, तो खुदा ने फ़रिश्तों से कहा कि क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि निश्चय मैं पृथिवी और आसमान की छिपी वस्तुओं को और प्रकट-छिपे कर्म्म को जानता हूँ॥            —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ३१।३३॥

समीक्षक—भला, ऐसे फ़रिश्तों को धोखा देकर अपनी बड़ाई करना खुदा का काम हो सकता है? यह तो एक दम्भ की बात है, इसको कोई विद्वान् नहीं मान सकता और न ऐसा अभिमान करता। क्या ऐसी बातों से ही खुदा अपनी सिद्धाई जमाना चाहता है? हां जङ्गली लोगों में कोई कैसा ही पाखण्ड चला लेवे, चल सकता है। सभ्यजनों में नहीं॥१०॥

११. जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि बाबा आदम को दण्डवत् करो, देखा सभों ने दण्डवत् किया, परन्तु शैतान ने न माना और अभिमान किया क्योंकि वो भी एक काफ़िर था॥                 —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ३४॥

समीक्षक—इससे ख़ुदा सर्वज्ञ नहीं। अर्थात् भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान की पूरी बातें नहीं जानता। जो जानता हो तो शैतान को पैदा ही क्यों किया? और ख़ुदा में कुछ तेज भी नहीं है, क्योंकि शैतान ने ख़ुदा का हुक्म ही न माना और ख़ुदा उसका कुछ भी न कर सका। और देखिए! एक शैतान काफ़िर ने ख़ुदा का भी छक्का छुड़ा दिया, तो मुसलमानों के कथनानुसार भिन्न जहाँ क्रोडों काफ़िर हैं, वहाँ मुसलमानों के ख़ुदा और मुसलमानों की क्या चल सकती है?

कभी-कभी ख़ुदा भी किसी का रोग बढ़ा देता, किसी को गुमराह कर देता है ख़ुदा ने ये बातें शैतान से सीखी होंगी और शैतान ने ख़ुदा से; क्योंकि विना ख़ुदा के शैतान का उस्ताद और कोई नहीं हो सकता॥११॥

१२. हमने कहा कि ओ आदम! तू और तेरी जोरू बहिश्त में रहकर आनन्द से जहाँ चाहो खाओ परन्तु मत समीप जाओ उस वृक्ष के कि पापी हो जाओगे॥ शैतान ने उनको डिगाया और उनको बहिश्त के आनन्द से खो दिया तब हमने कहा कि उतरो तुम्हारे में कोई परस्पर शत्रु है। तुम्हारा ठिकाना पृथिवी है और एक समय तक लाभ है॥ आदम अपने मालिक की कुछ बातें सीखकर पृथिवी पर आ गया॥                     —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ३५।३६।३७॥

समीक्षक—अब देखिये ख़ुदा की अल्पज्ञता! अभी तो स्वर्ग में रहने का आशीर्वाद दिया और पुनः थोड़ी देर में कहा कि निकलो। जो भविष्यत् बातों को जानता होता तो वर ही क्यों देता? और बहकानेवाले शैतान को दण्ड न देने से असमर्थ भी दीख पड़ता है। और वह वृक्ष किस के लिए उत्पन्न किया था? क्या अपने लिए वा दूसरे के लिए? जो अपने लिए किया तो उसको क्या जरूरत थी? और जो दूसरे के लिए, तो क्यों रोका? इसलिए ऐसी बातें न ख़ुदा की और न उसके बनाये पुस्तक में हो सकती हैं। आदम साहेब ख़ुदा से कितनी बातें सीख आये? और जब पृथिवी पर आदम साहेब आये तब किस प्रकार आये? क्या वह बहिश्त पहाड़ पर है वा आकाश पर? उससे कैसे उतर आये? अथवा पक्षी के तुल्य आये अथवा जैसे ऊपर से पत्थर गिर पड़े? इसमें यह विदित होता है कि जब आदम साहेब मट्टी से बनाये गये, तो इनके स्वर्ग में भी मट्टी होगी। और जितने वहां और हैं वे भी वैसे ही फ़रिश्ते आदि होंगे, क्योंकि मट्टी के शरीर विना इन्द्रिय भोग नहीं हो सकता। जब पार्थिव शरीर है, तो मृत्यु भी अवश्य होना चाहिए। यदि मृत्यु होता है, तो वे वहां से कहां जाते हैं? और मृत्यु नहीं होता, तो उनका जन्म भी नहीं हुआ। जब जन्म है, तो मृत्यु अवश्य ही है। यदि ऐसा है, तो जो क़ुरान में लिखा है कि बीबियाँ सदैव बिहिश्त में रहती हैं, सो झूठा हो जायगा, क्योंकि उनका भी मृत्यु अवश्य होगा। जब ऐसा है तो बिहिश्त में जानेवालों का भी मृत्यु निश्चित होगा॥१२॥

१३. उस दिन से डरो कि जब कोई जीव किसी जीव से कुछ भरोसा न रक्खेगा, न उसकी सिफ़ारिश स्वीकार की जावेगी, न उससे बदला लिया जावेगा और न वे सहाय पावेंगे॥               —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ४८॥

समीक्षक—क्या वर्त्तमान दिनों में न डरें? बुराई करने में सब दिन डरना चाहिए। जब सिफ़ारिश न मानी जावेगी, तो फिर पैग़म्बर की गवाही वा सिफ़ारिश से ख़ुदा स्वर्ग देगा, यह बात क्योंकर सच हो सकेगी? क्या खुदा बहिश्तवालों ही का सहायक है, दोज़ख़वालों का नहीं? यदि ऐसा है, तो ख़ुदा पक्षपाती है॥१३॥

१४. हमने मूसा को किताब और मौज़िजे दिये॥

समीक्षक—जो मूसा को किताब दी तो क़ुरान का होना निरर्थक है। और उसको आश्चर्यशक्ति दी यह बाइबल और क़ुरान में भी लिखा है, परन्तु यह बात मानने योग्य नहीं, क्योंकि जो ऐसा होता तो अब भी होता, जो अब नहीं, तो पहिले भी न था। जैसे स्वार्थी लोग आजकल भी अविद्वानों के सामने सिद्ध बन जाते हैं, वैसे उस समय भी कपट किया होगा, क्योंकि खुदा और उसके सेवक अब भी विद्यमान हैं, पुनः इस समय खुदा आश्चर्यकर्म क्यों नहीं देता और नहीं कर सकते? जो मूसा को किताब दी थी, तो पुनः क़ुरान का देना क्या आवश्यक था? क्योंकि जो भलाई बुराई करने न करने का उपदेश सर्वत्र एक-सा होता है, पुनः भिन्न-भिन्न पुस्तक करने से पुनरुक्त दोष होता है। क्या मूसाजी को दी हुई पुस्तक में खुदा भूल गया था॥ १४॥

१५. और कहो कि क्षमा मांगते हैं हम क्षमा करेंगे तुम्हारे पाप और निश्चय भलाई करने वालों के॥               —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ५८॥

समीक्षक—भला, यह खुदा का उपदेश सबको पापी बनानेवाला है वा नहीं? क्योंकि जब पाप क्षमा होने का आश्रय मनुष्यों को मिलता है तभी पापों से कोई भी नहीं डरता, इसलिए ऐसा कहनेवाला ख़ुदा और यह ख़ुदा का बनाया हुआ पुस्तक नहीं हो सकता। क्योंकि वह न्यायकारी है, अन्याय कभी नहीं करता और पाप क्षमा करने में अन्यायकारी हो ही जाता है; किन्तु यथापराध दण्ड ही देने में न्यायकारी हो सकता है॥१५॥

१६. जब मूसा ने अपनी कौम के लिए पानी माँगा हमने कहा कि अपना असा पत्थर पर मार। उसमें से बारह चश्मे बह निकले॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ६०॥

समीक्षक—अब देखिये! इन गपोड़ों के तुल्य दूसरा कोई-कोई होगा? भला! एक पत्थर की शिला में डंडा मारने से बारह झरने निकालना सर्वथा असम्भव है। जो उस पत्थर को भीतर से पोला कर, उसमें पानी भर, बारह छिद्र करने से सम्भव है, अन्यथा नहीं॥१६॥

१७. हमने उनको कहा कि तुम निन्दित बन्दर हो जाओ॥ यह एक भय दिया जो उनके सामने और पीछे थे उनको, और शिक्षा ईमानदारों को॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ५३॥ ६५।६६॥

समीक्षक—जो ख़ुदा ने निन्दित बन्दर हो जाना केवल भय देने के लिए कहा था, तो उसका कहना मिथ्या हुआ वा छल किया। जो ऐसी बातें करता और जिसमें ऐसी बातें हैं, वह न ख़ुदा और न यह पुस्तक ख़ुदा का बनाया हो सकता है॥१७॥

१८. इस तरह मुर्दों को अल्लाह जिलाता है और तुम को अपनी निशानियाँ दिखलाता है कि तुम समझो॥         —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ७३॥

समीक्षक—क्या मुर्दों को ख़ुदा जिलाता था तो अब क्यों नहीं जिलाता? क्या क़यामत की रात तक क़बरों में पड़े रहेंगे? आजकल दौड़ासुपुर्द हैं? क्या इतनी ही ईश्वर की निशानियाँ हैं? पृथिवी, सूर्य, चन्द्रादि निशानियाँ नहीं हैं? क्या जगत् में जो विविध रचनाविशेष प्रत्यक्ष दीखती हैं यह निशानियाँ कम हैं?॥१८॥

१९. वे सदैव काल बहिश्त अर्थात् वैकुण्ठ में वास करेंगे॥ किन्तु बुराई कमायें और उसको उसका अपराध घेर लेवे, ये लोग सदैव आग में वास करेंगे॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ८१, ८२॥

समीक्षक—कोई भी जीव अनन्त पाप पुण्य करने का सामर्थ्य नहीं रखता इसलिये सदैव स्वर्ग नरक में नहीं रह सकते। और जो ख़ुदा ऐसा करे तो वह अन्यायकारी और अविद्वान् हो जावे। क़यामत की रात न्याय होगा तो मनुष्यों के पाप पुण्य बराबर होना उचित है, जो अनन्त नहीं है उसका फल अनन्त कैसे हो सकता है? और सृष्टि हुए सात आठ हज़ार वर्षों से इधर ही बतलाते हैं क्या इसके पूर्व ख़ुदा निकम्मा बैठा था? और क़यामत के पीछे भी निकम्मा रहेगा? ये बातें सब लड़कों के समान हैं, क्योंकि परमेश्वर के काम सदैव वर्त्तमान रहते हैं और जितने जिसके पाप पुण्य हैं, उतना ही उसको फल देता है, इसलिये क़ुरान की यह बात सच्ची नहीं॥१९॥

२०. जब हमने तुमसे प्रतिज्ञा कराई न बहाना लोहू अपने आपस के और किसी अपने आपस को घरों से न निकालना, फिर प्रतिज्ञा की तुमने इसके तुम ही साक्षी हो॥ फिर तुम वे लोग हो कि अपने आपस को मार डालते हो, एक फ़िरके को आपमें से घरों उनके से निकाल देते हो।

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ८४।८५॥

समीक्षक—भला! प्रतिज्ञा करानी और करनी अल्पज्ञों की बात है वा परमात्मा की? जब परमेश्वर सर्वज्ञ है तो ऐसा कड़ाकूट संसारी मनुष्य के समान क्यों करेगा? भला यह कौन सी भली बात है कि आपस का लोहू न बहाना, अपने मत वालों को घर से न निकालना, अर्थात् दूसरे मत वालों का लोहू बहाना और घर से निकाल देना मिथ्या, मूर्खता और पक्षपात की बात नहीं है क्या? क्या परमेश्वर प्रथम ही से नहीं जानता था कि ये प्रतिज्ञा से विरुद्ध करेंगे? इससे विदित होता है कि मुसलमानों का ख़ुदा भी ईसाइयों की बहुत सी उपमा रखता है और यह क़ुरान स्वतन्त्र पुस्तक नहीं बन सकता क्योंकि इसमें से थोड़ी सी बातों को छोड़कर बाकी सब बातें बाइबल की हैं॥२०॥

२१. ये वे लोग हैं कि जिन्होंने आखरत के बदले जिन्दगी यहां की मोल ले ली, उनसे पाप कभी हलका न किया जावेगा और न उनको सहायता दी जावेगी॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ८६॥

समीक्षक—भला! ऐसी ईर्ष्या द्वेष की बातें कभी ईश्वर की ओर से हो सकती हैं? दूसरों की कहानी दूसरों से कहनी, किसी का पक्ष करना ख़ुदा की बात हो सकती है? किन्तु किसी मतावलम्बी मनुष्य की ओर से है। जिन लोगों के पाप हलके किये जायेंगे वा जिनको सहायता दी जावेगी वे कौन हैं? यदि वे पापी हैं और पापों का दण्ड दिये विना हलके किये जावेंगे तो अन्याय होगा। जो सजा देकर हलके किये जावेंगे, तो जिनका बयान इस आयत में है, ये भी सजा पाके हलके हो सकते हैं। और दण्ड देकर भी हलके न किये जावेंगे, तो भी अन्याय होगा। जो पापों से हलके किये जाने वालों से प्रयोजन धर्मात्माओं का है, तो उनके पाप तो आप ही हलके हैं; खुदा क्या करेगा? इससे यह लेख विद्वान् का नहीं। और वास्तव में धर्मात्माओं को सुख और अधर्म्मियों को दुःख, उनके कर्म्मों के अनुसार सदैव देना चाहिये॥२१॥

२२. निश्चय हमने मूसा को किताब दी और उसके पीछे हम कि पैगम्बर को लाये और मरियम के पुत्र ईसा को प्रकट मौज़िजे अर्थात् दैवीशक्ति और सामर्थ्य दिये उसको साथ रूहुल्कुद्सर्ि के, जब तुम्हारे पास उस वस्तुसहित पैग़म्बर आया कि जिसको तुम्हारा जी चाहता नहीं, फिर तुमने अभिमान किया, एक मत को झुठलाया और एक को मार डालते हो॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ८७॥

समीक्षक—जब क़ुरान में साक्षी है कि मूसा को किताब दी, तो उसका मानना मुसलमानों को आवश्यक हुआ और जो-जो उस पुस्तक में दोष हैं वे भी मुसलमानों के मत में आ गिरे। और ‘मौज़िजे’ अर्थात् दैवीशक्ति की बातें सब अन्यथा हैं, भोले भाले मनुष्यों को बहकाने के लिए लोगों ने झूठ-मूठ चला ली हैं, क्योंकि सृष्टिक्रम और विद्या से विरुद्ध सब बातें झूठी ही होती हैं। जो उस समय ‘मौज़िजे’ थे, तो इस समय क्यों नहीं? जो इस समय नहीं, तो उस समय भी न थे, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं॥२२॥

२३. और इससे पहिले काफ़िरों पर विजय चाहते थे, जो कुछ पहिचाना था, जब उनके पास वह आया, झट काफ़िर हो गये, काफ़िरों पर लानत है अल्लाह की॥                                —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ८९॥

समीक्षक—क्या जैसे तुम अन्य मत वालों को काफ़िर कहते हो, वैसे वे तुमको काफ़िर कहते हैं? और उनके मत के ईश्वर की ओर से धिक्कार देते हैं? फिर कहो कौन सच्चा और कौन झूठा? जो विचार कर देखते हैं तो सब मत वालों में झूठ पाया जाता है और जो सच है सो सबमें एक सा है, ये सब लड़ाइयाँ मूर्खता की हैं॥२३॥

२४. आनन्द का सन्देसा ईमानदारों को॥ जो अल्लाह फ़रिश्तों, पैग़म्बरों, ज़िबरईल और मिकाईल का शत्रु है अल्लाह भी ऐसे काफ़िरों का शत्रु है॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ९७।९८॥

समीक्षक—जब मुसलमान कहते हैं कि ‘ख़ुदा लाशरीक’ है फिर यह फौज की फौज ‘शरीक’ कहां से कर दी? क्या जो शैतान का शत्रु वह परमेश्वर का भी शत्रु है? क्या वह ख़ुदा की आज्ञा से विरुद्ध नहीं चलता? इससे ख़ुदा पक्षपाती होता है॥२४॥

२५. और अल्लाह ख़ास करता है जिसको चाहता है दया करता है॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ १०५॥

समीक्षक—क्या जो मुख्य करने के योग्य न हो, न दया करने योग्य हो, उसको भी प्रधान बनाता और उस पर दया करता है? जो ऐसा है तो ख़ुदा बड़ा गड़बड़िया है क्योंकि फिर अच्छा काम कौन करे? और बुरे कर्म को कौन छोड़ेगा? क्योंकि ख़ुदा की प्रसन्नता पर सब बातें निर्भर करती हैं, कर्मफल पर नहीं। इससे सबको अनास्था होकर धर्मोच्छेदप्रसङ्ग होगा॥२५॥

२६. ऐसा न हो कि काफ़िर लोग ईर्ष्या करके तुमको ईमान से फेर देवें, क्योंकि उनमें से ईमानवालों के बहुत से दोस्त हैं॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ १०९॥

समीक्षक—अब देखिये! ख़ुदा ही उनको चिताता है कि तुम्हारे ईमान को काफ़िर लोग न डिगा देवें। क्या वह सर्वज्ञ नहीं है? ऐसी बातें ख़ुदा की नहीं हो सकती हैं॥२६॥

२७. तुम जिधर मुँह करो, उधर ही मुँह अल्लाह का है॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ११५॥

समीक्षक—जो यह बात सच्ची है तो मुसलमान ‘क़िबले’ की ओर मुंह क्यों करते हैं? जो कहें हमको किबले की ओर मुंह फेरने का हुक्म है, तो यह भी हुक्म है कि चाहे जिधर की ओर मुख करो, क्या एक बात सच्ची और दूसरी झूठी होगी? और जो अल्लाह का मुख है, तो वह सब ओर हो ही नहीं सकता, क्योंकि एक मुख एक ओर रहेगा, सब ओर क्योंकर रह सकेगा? इसलिए यह संगत नहीं॥२७॥

२८. वो आसमान और भूमि का उत्पन्न करने वाला है, जब वो कुछ करना चाहता है यह नहीं कि उसको करना पड़ता है किन्तु उसे कहता है कि हो जा! बस हो जाता है॥                        —मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ ११७॥

समीक्षक—भला ख़ुदा ने हुक्म दिया कि होजा, तो हुक्म किसने सुना? और किसको सुनाया? और कौन बन गया? किस कारण से बनाया? जब यह लिखते हैं कि सृष्टि के पूर्व सिवाय ख़ुदा के कोई भी दूसरा वस्तु न था, तो यह संसार कहां से आया? विना कारण के कोई भी कार्य्य नहीं होता, तो इतना बड़ा जगत् कारण के विना कहां से हुआ? यह बात केवल लड़केपन की है।

पूर्वपक्षी—ख़ुदा की इच्छा से।

उत्तरपक्षी—क्या तुम्हारी इच्छा से एक मक्खी की टांग भी बन जा सकती है? जो कहते हो कि ख़ुदा की इच्छा से यह सब कुछ जगत् बन गया।

पूर्वपक्षी—ख़ुदा सर्वशक्तिमान् है इसलिए जो चाहे सो कर लेता है।

उत्तरपक्षी—सर्वशक्तिमान् शब्द का क्या अर्थ है?

पूर्वपक्षी—जो चाहे सो कर सके।

उत्तरपक्षी—क्या ख़ुदा दूसरा ख़ुदा भी बना सकता, अपने आप मर सकता, मूर्ख, रोगी और अज्ञानी भी बन सकता है?

पूर्वपक्षी—ऐसा कभी नहीं बन सकता।

उत्तरपक्षी—इसलिए परमेश्वर अपने और दूसरों के गुण, कर्म स्वभाव के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकता। जैसे संसार में किसी वस्तु के बनने बनाने में तीन पदार्थ प्रथम अवश्य होते हैं—एक बनाने वाला जैसा कुम्हार, दूसरी घड़ा बनने वाली मिट्टी और तीसरा उनके साधन जिससे घड़ा बनाया जाता है। जैसे कुम्हार, मिट्टी और साधन से घड़ा बनता है और बनने वाले घड़े के पूर्व कुम्हार, मिट्टी और साधन होते हैं, वैसे ही जगत् के बनने से पूर्व परमेश्वर, जगत् का कारण प्रकृति और उनके गुण, कर्म, स्वभाव अनादि हैं इसलिए यह क़ुरान की बात सर्वथा मिथ्या है॥२८॥

२९. जब हमने लोगों के लिए काबे को पवित्र स्थान सुख देने वाला, उपद्रव रहित बनाया, तुम नमाज़ के लिए इबराहीम के स्थान को पकड़ो॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ १२५॥

समीक्षक—क्या क़ि़बले के पहले पवित्र स्थान खुदा ने कोई भी बनाया था वा नहीं? जो बनाया था तो किबले के बनाने की कुछ आवश्यकता नहीं, जो नहीं बनाया था, तो बिचारे पूर्वोत्पन्नों को पवित्र स्थान के विना ही रक्खा था। जब कुरान बनाई थी, तब ईश्वर को पवित्र स्थान बनाने का स्मरण न हुआ होगा॥२९॥

३०. वो कौन मनुष्य है जो इबराहीम के दीन से फिर जावे परन्तु जिसने अपनी जान को मूर्ख बनाया और निश्चय हमने दुनियां में उसी को पसन्द किया। और निश्चय आख़रत में वो ही नेक हैं॥

—मं॰ १। सि॰ १। सू॰ २। आ॰ १३०॥

समीक्षक—क्या मुसलमान लोग इबराहीम के मजहब से बहुत नहीं फिर गये हैं? क्या यह खुदा की बात है कि जो उसको मूर्ख प्रसन्न होेंवें, विद्वान् नहीं? यह बात अविद्वत्ता की है अर्थात् जब इस पुस्तक के बनाने वाले ने समझा कि मैं अविद्वान् हूं और विद्वान् लोग मेरी बात को काटेंगे, मैं उत्तर न दे सकूंगा, इसलिए धर्मविषय में मूर्ख के समान होकर जो कुछ अण्ड-बण्ड कहै, सब कुछ मान लेना चाहिए। जो ऐसा न करता तो लोग उसके मजहब में न आते, आ के न स्थिर रहते और न उसका प्रयोजन सिद्ध होता। हां! यह तो ठीक है कि जो धर्मात्मा है, वही ईश्वर को प्रिय होता है, अधर्मी नहीं॥३०॥

३१. निश्चय हम तेरे मुख को आसमान में फिरता देखते हैं अवश्य हम तुझे उस क़िबले को फेरेंगे कि पसन्द करे उसको, बस अपना मुख मस्जिदुल्हराम की ओर फेर, जहां कहीं तुम हो अपना मुख उसकी ओर फेर लो॥

—मं॰ १। सि॰ २। सू॰ २। आ॰ १४४॥

समीक्षक—क्या यह छोटी बुतपरस्ती है? नहीं, किन्तु बड़ी।

प्रश्न—हम मुसलमान लोग बुतपरस्त नहीं हैं किन्तु बुतशिकन अर्थात् बुतों के तोड़नेहारे हैं, क्योंकि हम क़िबले को ख़ुदा नहीं समझते।

उत्तर—तो क्या जिन को तुम बुतपरस्त समझते हो, वे भी उस-उस मूर्त्ति को ईश्वर नहीं समझते? किन्तु उसके सामने परमेश्वर की भक्ति करते हैं। यदि बुतों के तोड़नेहारे हो तो उस मस्जिद क़िबले बड़े बुत को क्यों न तोड़ा?

प्रश्न—वाह जी! हमारा तो क़िबले की ओर मुख फेरने का क़ुरान में हुक्म है और इनको वेद में हुक्म नहीं है फिर वे बुतपरस्त क्यों नहीं? और हम क्यों? क्योंकि हम को ख़ुदा का हुक्म बजाना अवश्य है।

उत्तर—जैसे तुम्हारे लिये क़ुरान में हुक्म है वैसे इनके लिये पुराण में आज्ञा है। जैसे तुम क़ुरान को ख़ुदा का कलाम समझते हो वैसे पुराणी भी पुराणों को ख़ुदा के अवतार व्यासजी का वचन समझते हैं। तुम में और इन में बुतपरस्ती का कुछ भिन्न भाव नहीं है प्रत्युत तुम बड़े बुतपरस्त और ये छोटे हैं। क्योंकि जब तक कोई मनुष्य अपने घर में से प्रविष्ट हुई बिल्ली को निकालने लगे, तब तक उसके घर में ऊंट प्रविष्ट हो जाय, वैसे ही मुहम्मद साहेब ने छोटे बुत को मुसलमानों के मन से निकाला, परन्तु बड़ा बुत जो कि पहाड़ के सदृश मक्के की मस्जिद है, वह सब मुसलमानों के मन में प्रविष्ट करा दिई, क्या यह छोटी बुतपरस्ती है? हां, जो हम लोग वैदिक हैं वैसे ही तुम भी वैदिक हो जाओ, तो बुतपरस्ती आदि बुराइयों से बच सको, अन्यथा नहीं। तुमको ‘जब तक अपनी बड़ी बुतपरस्ती को न निकाल देओ तब तक’ दूसरे छोटे बुतपरस्तों के खण्डन से लज्जित होके, निवृत्त रहना चाहिये और अपने को बुतपरस्ती से पृथक् करके पवित्र करना चाहिये॥३१॥

३२. जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे जाते हैं उनके लिए यह मत कहो कि ये मृतक हैं किन्तु वे जीवित हैं॥             —मं॰ १। सि॰ २। सू॰ २। आ॰ १५४॥

समीक्षक—भला ईश्वर के मार्ग में मरने मारने की क्या आवश्यकता है? यह क्यों नहीं कहते हो कि यह बात अपने मतलब सिद्ध करने

के लिये है कि यह लोभ देंगे तो लोग खूब लड़ेंगे, अपना विजय होगा, मरने से न डरेंगे, लूट मार करने से ऐश्वर्य प्राप्त होगा, पश्चात् विषयानन्द करेंगे इत्यादि स्वप्रयोजन के लिये यह विपरीत व्यवहार किया है॥३२॥

३३. इनर्ि लोगों पर इनके मालिक की ओर से दया और दरुद हैं और ये ही मार्ग पाने वाले हैं।                          —मं॰ १। सि॰ २। सू॰ २। आ॰ १५७॥

समीक्षक—अब देखिये! यह काम भी एक प्रकार की बुतपरस्ती है। भला! मुर्दों पर आयतें पढ़ने से क्या होता है? क्योंकि उसका जीवात्मा तो पहले ही चला गया, पुनः पाठ कौन सुनेगा? इसलिये यह व्यर्थ कर्म है, इत्यादि से यह पुस्तक ईश्वरकृत वा विद्वत्कृत भी नहीं है॥३३॥

३४. जो लोग छिपाते हैं उसको जो कि हमने प्रमाणों और शिक्षा से उतारा। उसके बीच में जो कुछ है अल्लाह की और धिक् देने वालों की धिक्कार है। परन्तु जिन्होंने तोबाः और भलाई करी, उनके ऊपर फिर दया करता हूं और करूंगा। जो लोग काफिर हुए, फिर मर गये, और काफिर ही रहे, उन पर खुदा फरिश्तों और सब आदमियों पर धिक्कार है। सदैव उसी में रहेंगे। उनसे पाप कभी हलका न किया जायगा और न वे ढील दिये जायेंगे। तुम्हारा एक ही मालिक है और कोई नहीं। वह क्षमा करने वाला दयालु है॥

—मं॰ १। सि॰ २। आ॰ १५९,१६०,१६१, १६२,१६३॥

समीक्षक—यह बात जो कि पहले पैगम्बरों के सामने जैसा कि इबराहीम साहेब के सामने खतनः आदि के नियम बांधे थे, उनको जो नहीं करते और शहर मक्के में सफा और मुरब्बः दो पहाड़ हैं, अरब के लोग इबाराहीम के समय से सदैव हज करते रहे, परन्तु मुसलमानों ने किसी कारण से छोड़ दी थी, उस पर यह आयत उतरी, उन्हीं को धिक्कार दिया जाता है और जो मुसलमान तोबाः करले तो माफ हो जाय, परन्तु जो काफिर अर्थात् मुसलमान के मजहब में नहीं हैं, उन पर ख़ुदा बड़ा खार खाता है। भला! ऐसी बातें कभी ख़ुदा की हो सकती हैं? और जो पक्षपाती है, वह ईश्वर कभी नहीं हो सकता। क्या मुसलमानों पर क्षमा करने वाला दयालु है, अन्य पर दयाकर्त्ता दयाहीन कहा जावे? इसी से न यह ईश्वरकृत पुस्तक और न इसमें कहा हुआ ईश्वर हो सकता है॥३४॥

३५. और यह कि अल्लाह कठोर दुःख देने वाला है॥ शैतान का पक्ष मत करो निश्चय वो तुम्हारा प्रत्यक्ष शत्रु है।। उसके विना और कोई नहीं जो बुराई और निर्लज्जता की आज्ञा दे तुम कहो अल्लाह पर जो नहीं जानते॥

—मं॰ १ सि॰ २। सू॰ २। आ॰ १६५।१६८।१६९॥

समीक्षक—क्या कठोर दुःख देने वाला दयालु ख़ुदा सब पापियों पुण्यात्माओं पर है अथवा मुसलमानों पर दयालु और अन्य पर दयाहीन है? जो ऐसा है, तो वह ईश्वर ही नहीं हो सकता। और पक्षपाती नहीं है तो जो मनुष्य जहां कहीं धर्म करेगा, उस पर ईश्वर दयालु और जो अधर्म करेगा, उस पर दण्डदाता होगा, तो फिर बीच में मुहम्मद साहेब और क़ुरान को मानना आवश्यक न रहा। और जो सब को बुराई कराने वाला मनुष्यमात्र का शत्रु शैतान है, उसको खुदा ने उत्पन्न ही क्यों किया? क्या वह भविष्यत् की बात नहीं जानता था? जो कहो कि जानता था, परन्तु परीक्षा के लिये बनाया, तो भी नहीं बन सकता, क्योंकि परीक्षा करना अल्पज्ञ का काम है, सर्वज्ञ तो सब जीवों के अच्छे बुरे कर्मों को सदा से ठीक-ठीक जानता है। और शैतान सब को बहकाता है, तो शैतान को किसने बहकाया? जो कहो कि शैतान आप से आप बहका, तो अन्य भी आप से आप बहकेंगे, बीच में शैतान का क्या काम? और जो ख़ुदा ही ने शैतान को बहकाया, तो ख़ुदा शैतान का भी शैतान ठहरेगा। ऐसी बात ईश्वर की नहीं हो सकती। और जो कोई बहकता है, वह कुसंग तथा अविद्या से भ्रमित होता है॥३५॥

३६. तुम पर मुर्दार, लोहू और गोश्त सूअर का हराम है और अल्लाह के विना जिस पर कुछ पुकारा जावे॥        —मं॰ १। सि॰ २। सू॰ २। आ॰ १७३॥

समीक्षक—यहां विचारना चाहिये कि मुर्दा चाहे आप से आप मरे वा किसी के मारने से, दोनों बराबर हैं, हां इनमें कुछ भेद भी है तथापि मृतकपन में कुछ भेद नहीं। जो लोहू हराम है, तो मरे पीछे लोहू शरीर ही में जम कर मांस हो जाता है, फिर मांस खाना मुसलमानों के लिये सर्वथा हराम रहा और जब एक सूअर का निषेध किया, तो क्या मनुष्य का मांस खाना उचित है? क्या यह बात अच्छी हो सकती है कि परमेश्वर के नाम पर पशु आदि को अत्यन्त दुःख दे के प्राणहत्या करनी? इससे ईश्वर का नाम कलंकित हो जाता है। हां ईश्वर ने विना पूर्वजन्म के अपराध के मुसलमानों के हाथ से दारुण दुःख क्यों दिलाया? क्या उन पर दयालु नहीं हैं? उनको पुत्रवत् नहीं मानता? जिस वस्तु से अधिक उपकार होवे, उन गाय आदि के मारने का निषेध न करना, जानो हत्या कराकर खुदा जगत् का हानिकारक, हिंसारूप पाप से कलंकित भी हो जाता है। ऐसी बातें खुदा और खुदा के पुस्तक की कभी नहीं हो सकतीं॥३६॥

३७. रोज़े की रात तुम्हारे लिये हलाल की गई कि मदनोत्सव करना अपनी बीबियों से, वे तुम्हारे वास्ते पर्दा हैं और तुम उनके लिये पर्दा हो, अल्लाह ने जाना कि तुम चोरी करते हो अर्थात् व्यभिचार बस फिर अल्लाह ने क्षमा किया तुम को, बस उनसे मिलो और ढूंढो जो अल्लाह ने तुम्हारे लिये लिख दिया है अर्थात् सन्तान, खाओ पीयो यहां तक कि प्रकट हो तुम्हारे लिये काले तागे से सुफेद तागा वा रात से जब दिन निकले॥             —मं॰ १। सि॰ २। सू॰ २। आ॰ १८७॥

समीक्षक—यहाँ यह निश्चित होता है कि जब मुसलमानों का मत चला वा उसके पहिले किसी ने किसी पौराणिक को पूछा होगा कि चान्द्रायण व्रत जो एक महीने भर का होता है उसका विधि क्या [है]? वह शास्त्रविधि जो कि मध्याह्न में चन्द्र की कला घटने बढ़ने के अनुसार ग्रासों को घटाना बढ़ाना और मध्याह्न दिन में खाना लिखा है उसको न जान कर कहा होगा कि चन्द्रमा का दर्शन करके खाना, उसको इन मुसलमान लोगों ने इस प्रकार का कर लिया। परन्तु व्रत में स्त्री समागम का त्याग है वह एक बात खुदा ने बढ़ कर कह दी कि तुम स्त्रियों का भी समागम भले ही किया करो और रात में चाहें अनेक वार खाओ। भला यह व्रत क्या हुआ? दिन में न खाया, रात को खाते रहे, परन्तु यह सृष्टिक्रम से विपरीत है कि दिन में न खाना और रात में खाना॥३७॥

३८. अल्लाह के मार्ग में लड़ो उन से जो तुम से लड़ते हैं। मार डालो तुम उनको जहां पाओ, क़तल से कुफ्र बुरा है। यहां तक उन से लड़ो कि कुफ्र न रहे और होवे दीन अल्लाह का॥ उन्होंने जितनी ज़ियादती करी तुम पर, उतनी ही उन के साथ करो॥       —मं॰ १। सि॰ २। सू॰ २। आ॰ १९०।१९१।१९३।१९४॥

समीक्षक—जो क़ुरान में ऐसी बातें न होती, तो मुसलमान लोग इतना बड़ा अपराध जो कि अन्य मत वालों पर किया है न करते, और विना अपराधियों को मारना उन पर बड़ा पाप है। जो मुसलमान के मत का ग्रहण न करे, उसको कुफ्र कहते हैं अर्थात् कुफ्र से क़त्ल को मुसलमान लोग अच्छा मानते हैं। अर्थात् जो हमारे दीन को न मानेगा उसको हम क़त्ल करेंगे सो करते ही आये, मज़हब पर लड़ते-लड़ते आप ही राज्य आदि से नष्ट हो गये और उनका मन अन्य मत वालों पर अति कठोर रहता है। क्या चोरी का बदला चोरी है? कि जितना हमारा अपराध चोर आदि चोरी [से] करें क्या हम भी चोरी करें? यह सर्वथा अन्याय की बात है। क्या कोई अज्ञानी हमको गालियां दे, क्या हम भी उसको गाली देवें? यह बात न ईश्वर, न ईश्वर के भक्त विद्वान् की और न ईश्वरोक्त पुस्तक की हो सकती है। यह तो केवल स्वार्थी अज्ञानी मनुष्य की है॥३८॥

३९. अल्लाह झगड़ा करने वाले को मित्र नहीं करता॥ ऐ लोगो! जो ईमान लाये हो इसलाम में प्रवेश करो॥ —मं॰ १। सि॰ २। सू॰ २। आ॰ २०५।२०८॥

समीक्षक—जो झगड़ा करने वाले को ख़ुदा मित्र नहीं समझता तो क्यों आप ही मुसलमानों को झगड़ा करने में प्रेरणा करता और झगड़ालू मुसलमानों से मित्रता क्यों करता है? क्या मुसलमान के मत में मिलने ही में ख़ुदा राज़ी है? तो वह मुसलमानों ही का पक्षपाती है सब संसार का ईश्वर नहीं। इससे यहां यह विदित होता है कि न क़ुरान ईश्वरकृत और इसमें कहा हुआ ईश्वर भी नहीं हो सकता है॥३९॥

४०. ख़ुदा जिसको चाहे अनन्त आनन्द देवे॥

—मं॰ १। सि॰ २। सू॰ २। आ॰ २१२॥

समीक्षक—क्या विना पाप पुण्य के ख़ुदा ऐसे ही आनन्द देता है? फिर भलाई बुराई का करना एक सा ही हुआ, क्योंकि सुख दुःख प्राप्त होना उसकी इच्छा पर है। इससे धर्म से विमुख होकर मुसलमान लोग यथेष्टाचार करते हैं और कोई-कोई इस क़ुरानोक्त पर विश्वास न करके धर्मात्मा भी होते हैं॥४०॥

४१. प्रश्न करते हैं तुझ से रजस्वला को कह वो अपवित्र हैं, पृथक् रहो, ऋतु समय में उन के समीप मत जाओ, जब तक कि वे पवित्र न हों, जब नहा लेवें, उन के पास उस स्थान से जाओ ख़ुदा ने आज्ञा दी॥ तुम्हारी बीवियां तुम्हारे लिये खेतियां हैं, बस जाओ जिस तरह चाहो अपने खेत में॥ तुम को अल्लाह लग़ब (बेकार, व्यर्थ) शपथ के तोड़ने में नहीं पकड़ता॥

—मं॰ १। सि॰ २। सू॰ २। आ॰ २२२।२२३।२२५॥

समीक्षक—जो यह रजस्वला का स्पर्श, संग न करना लिखा है, वह अच्छी बात है। परन्तु जो यह स्त्रियों को खेती के तुल्य लिखना और जैसा जिस ओर से चाहो उनसे बर्तो यह मनुष्यों को विषयी करने और पुंसि मैथुन का भी कारण हो सकता है। जो ख़ुदा बेकार शपथ पर नहीं पकड़ता, तो सब झूठ बोलेंगे शपथ तोड़ेंगे। इससे ख़ुदा झूठ का प्रवर्त्तक होगा॥४१॥

४२. वो कौन मनुष्य है जो अल्लाह को उधार देवे़, अच्छा बस अल्लाह द्विगुण करे उसके वास्ते॥            —मं॰ १। सि॰ २। सू॰ २। आ॰ २४५॥

समीक्षक—अब देखिये यह क़ुरान बनाने वा बनवाने वाले की मतलबसिन्धु की बात! कि ईश्वर के नाम से लोगों से धन ठग के स्वप्रयोजन सिद्ध करना चाहता है। क्या ईश्वर उसको धन नहीं दे सकता था१ और क्या उस का ख़जाना खाली हो गया था? तथा क्या वह हुंडी, पुड़िया व्यापारादि में मग्न होने से तोटा में फंस गया था जो उधारर्ि लेने लगा? और एक का दो-दो देना स्वीकार करता है, क्या यह साहूकारों का काम है? किन्तु ऐसा काम तो दिवालिये वा जिनके ख़र्च अधिक और आय न्यून होने वालों को करना पड़ता है, ईश्वर को नहीं॥४२॥

४३. उनमें से कोई ईमान लाया और कोई काफ़िर हुआ जो अल्लाह चाहता न लड़ते, जो चाहता है अल्लाह करता है॥ —मं॰ १। सि॰ २। सू॰ २। आ॰ २५३॥

समीक्षक—क्या जितनी लड़ाई होती है वह ईश्वर ही की इच्छा से? क्या वह अधर्म करना चाहे, तो कर सकता है? जो ऐसी बात है, तो वह ख़ुदा ही नहीं, क्योंकि भले मनुष्यों का यह कर्म नहीं कि शान्तिभंग करके लड़ाई करावें। इसीसे विदित होता है कि यह क़ुरान न ईश्वर की बनाई और न किसी धार्मिक विद्वान् की रचित है॥४३॥

४४. जो कुछ आसमान और पृथिवी पर है सब उसी के लिये है, चाहे उसकी कुर्सी में आसमान और पृथिवी को समा लेवे॥ —मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ २। आ॰ २५५॥

समीक्षक—जो आकाश और भूमि में पदार्थ हैं वे सब जीवों के लिये परमात्मा ने उत्पन्न किये हैं, अपने लिये नहीं, क्योंकि वह पूर्णकाम है, उसको किसी पदार्थ की अपेक्षा नहीं। जब उसकी कुर्सी है, तो वह एकदेशी है। जो एकदेशी होता है, वह ईश्वर नहीं कहाता, क्योंकि ईश्वर तो व्यापक है॥४४॥

४५. मेरा मालिक सूर्य्य को पूर्व से लाता है बस तू पश्चिम से ले आ, जो क़ाफिर था हैरान हुआ, निश्चय अल्लाह पापियों को मार्ग नहीं दिखलाता॥

—मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ २। आ॰ २५८॥

समीक्षक—देखिये यह अविद्या की बात! भला सूर्य्य न पूर्व से पश्चिम और न पश्चिम से पूर्व कभी आता जाता है, वह तो अपनी परिधि में घूमता रहता है। इससे निश्चित जाना जाता है क़ुरान के कर्त्ता को न खगोल और [न] भूगोल विद्या आती थी। जो पापियों को मार्ग नहीं बतलाता तो पुण्यात्माओं के लिये भी मुसलमानों के ख़ुदा की आवश्यकता नहीं, क्योंकि धर्मात्मा तो धर्म मार्ग में ही होते हैं, मार्ग तो धर्म से भूले हुए मनुष्यों को बतलाना होता है, सो कर्त्तव्य के न करने से क़ुरान के कर्त्ता की बड़ी भूल है॥४५॥

४६. कहा चार जानवरों से ले उनकी सूरत पहिचान रख, फिर हर पहाड़ पर उन में से एक-एक टुकड़ा रख दे, फिर उन को बुला दौड़ते तेरे पास चले आवेंगे॥

—मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ २। आ॰ २६०॥

समीक्षक—वाह-वाह देखो जी! मुसलमानों का ख़ुदा भानमती के समान खेल कर रहा है! क्या ऐसी ही बातों से ख़ुदा की ख़ुदाई है? तो बुद्धिमान् लोग ऐसे ख़ुदा को तिलाञ्जलि देके दूर रहेंगे और मूर्ख लोग फसेंगे। इससे ख़ुदा की बड़ाई के बदले बुराई उसके पल्ले पड़ेगी॥४६॥

४७. जिस को चाहे नीति देता है॥ —मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ २। आ॰ २६९॥

समीक्षक—जब जिसको चाहता नीति देता है, तो जिसको नहीं चाहता है उसको अनीति देता होगा, यह बात ईश्वरता की नहीं। किन्तु जो पक्षपात छोड़ सब को नीति का उपदेश करता है, वही ईश्वर और आप्त हो सकता है, अन्य नहीं॥४७॥

४८. जो लोग ब्याज खाते हैं वे कबरों से नहीं खड़े होंगे॥

—मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ २। आ॰ २७५॥

समीक्षक—क्या वे कबरों ही में पड़े रहेंगे? और जो पड़े रहेंगे, तो कब तक? ऐसी असम्भव बात ईश्वर के पुस्तक की तो नहीं हो सकती है, किन्तु बालबुद्धियों की तो हो सकती है॥४८॥

४९. वह कि जिसको चाहे क्षमा करेगा, जिसको चाहे पापी बनावेगा, क्योंकि वह सब वस्तु पर बलवान् है॥      —मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ २। आ॰ २८४॥

समीक्षक—क्या क्षमा के योग्य पर क्षमा न करना, अयोग्य पर क्षमा करना गवरगंड राजा के तुल्य यह कर्म नहीं है? यदि ईश्वर जिसको चाहता पापी वा पुण्यात्मा बनाता है तो जीव को पाप पुण्य न लगना चाहिये, क्योंकि जब ईश्वर ही ने उसको वैसा किया तो जीवों को दुःख-सुख न होना चाहिये। जैसे सेनापति की आज्ञा से किसी भृत्य ने किसी को मारा वा रक्षा की उसका फलभागी वह नहीं होता वैसे वे भी नहीं॥४९॥

५०. कह इससे अच्छी और क्या परहेज़गारों को खबर दे कि अल्लाह की ओर से बहिश्तें हैं जिन में नहरें चलती हैं उन्हीं में सदैव रहने वाली शुद्ध अर्थात् गोरी-गोरी बीबियाँ हैं अल्लाह की प्रसन्नता से, अल्लाह उनको देखने वाला है साथ बन्दों के॥                        —मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ ३। आ॰ १४॥

समीक्षक—भला यह स्वर्ग है किंवा वेश्यावन? इसको ईश्वर कहना वा स्त्रैण अर्थात् स्त्रियों में प्रसक्त? कोई भी बुद्धिमान्, ऐसी बातें जिस में हों, उसको परमेश्वर का किया पुस्तक कभी नहीं मान सकते। यह पक्षपात क्यों करता है? जो बीबियां बहिश्त में सदा रहती हैं, वे यहां जन्म पाके वहां गई हैं वा वहीं उत्पन्न हुई हैं। यदि यहां जन्म पाकर वहां गई हैं, क़यामत की रात से पहिले ही वहां बीबियों को बुला लिया तो उनके खाविन्दों को क्यों न बुला लिया? और क़यामत की रात में सब का न्याय होगा, इस नियम को क्यों तोड़ा? यदि वहीं जन्मीं हैं, तो क़यामत तक वे क्योंकर निर्वाह करती हैं? यदि फरिश्तों से निर्वाह करती हैं, तो यहाँ से बहिश्त में जाने वाले मुसलमानों को ख़ुदा बीबियां कहां से देगा? क्या क्षतयोनि ही उनको देगा और जैसे बीबियां बहिश्त में सदा रहनेवाली बनाई, वैसे पुरुषों को वहां सदा रहने वाले क्यों नहीं बनाया? इसीलिये मुसलमानों का ख़ुदा अन्यायकारी, बेसमझ है॥५०॥

५१. निश्चय अल्लाह की ओर से दीन इसलाम है और नहीं॥

—मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ ३। आ॰ १८॥

समीक्षक—क्या अल्लाह मुसलमानों ही का है अन्यों का नहीं? क्या तेरह सौ वर्षों के पूर्व ईश्वरीय मत था ही नहीं? इसी से यह क़ुरान ईश्वर का बनाया तो नहीं, किन्तु किसी पक्षपाती का बनाया है॥५१॥

५२. प्रत्येक जीव को पूरा दिया जावेगा जो कुछ उसने कमाया और वे न अन्याय किये जावेंगे॥ कह या अल्लाह तू ही मुल्क का मालिक है जिसको चाहे देता है जिससे चाहे छीनता है जिसको चाहे प्रतिष्ठा देता है जिसको चाहे अप्रतिष्ठा देता है, सब कुछ तेरे ही हाथ में है, प्रत्येक वस्तु पर तू ही बलवान् है॥ रात को दिन में और दिन को रात में पैठाता है और मृतक को जीवित से जीवित को मृतक से निकालता है और जिसको चाहे अत्यन्त अन्न देता है॥ मुसलमानों को उचित है कि काफिरों को मित्र न बनावें सिवाय मुसलमानों के, जो कोई यह करे, बस वह अल्लाह की ओर से नहीं॥ कह जो तुम चाहते हो अल्लाह को, तो पक्ष करो मेरा, अल्लाह चाहेगा तुमको और तुम्हारे पाप क्षमा करेगा, निश्चय करुणामय है॥

—मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ ३। आ॰ २४।२५।२६।२७।३०॥

समीक्षक—जब प्रत्येक जीव को कर्मों का पूरा-पूरा फल दिया जावेगा तो क्षमा न किया जायगा, और जो क्षमा किया जायगा तो पूरा फल न दिया जायगा और अन्याय होगा। जब विना उत्तम कर्मों के राज्य प्रतिष्ठा देगा, तो भी ईश्वर अन्यायी हो जायगा और विना पाप के राज्य और प्रतिष्ठा छीन लेगा, तो भी अन्यायकारी हो जायगा। भला! रात में दिन, दिन में रात और जीवित से मृतक और मृतक से जीवित कभी हो सकता है? क्योंकि ईश्वर की व्यवस्था अछेद्य अभेद्य है, कभी अदल-बदल नहीं हो सकती। अब देखिये। पक्षपात की बातें! कि जो मुसलमान के मज़हब में नहीं हैं उनको काफिर ठहराना, उनमें श्रेष्ठों से भी मित्रता न रखने और मुसलमानों में दुष्टों से भी मित्रता रखने के उपदेश करना ईश्वर को ईश्वरता से बहिः कर देता है। इससे यह क़ुरान, क़ुरान का ख़ुदा और मुसलमान लोग केवल पक्षपात, अविद्या के भरे हुए हैं। इसलिये मुसलमान लोग अन्धेरे में हैं। और देखिये मुहम्मद साहेब की लीला! कि जो तुम मेरा पक्ष करोगे तो ख़ुदा तुम्हारा पक्ष करेगा और जो तुम पक्षपातरूप पाप करोगे उसकी क्षमा भी करेगा। इससे सिद्ध होता है कि मुहम्मद साहेब का अन्तःकरण शुद्ध नहीं था। इसीलिये अपने मतलब सिद्ध करने के लिये मुहम्मद साहेब ने क़ुरान बनाया वा बनवाया ऐसा विदित होता है॥५२॥

५३. जिस समय कहा फरिश्तों ने कि ऐ मर्य्यम तुझ को अल्लाह ने पसन्द किया और पवित्र किया ऊपर जगत् की स्त्रियों के॥ —मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ ३। आ॰ ४१॥

समीक्षक—भला! जब आजकल ख़ुदा के फ़रिश्ते और ख़ुदा किसी से बातें करने को नहीं आता, तो प्रथम भी नहीं आया होगा। जो कहो कि पहिले के मनुष्य पुण्यात्मा थे, अब के नहीं, तो यह बात मिथ्या है। किन्तु जिस समय ईसाई और मुसलमानों का मत चला था, उस समय उन देशों में जङ्गली और विद्याहीन मनुष्य अधिक थे, इसीलिये ऐसे विद्याविरुद्ध मत चल गये। अब विद्वान् अधिक हैं, इसलिये नहीं चल सकता। किन्तु जो-जो ऐसे पोकल मज़हब हैं, वे भी अस्त होते जाते हैं, वृद्धि की तो कथा ही क्या है!॥५३॥

५४. उसको कहता है कि हो, बस हो जाता है॥ काफ़िरों ने धोखा दिया, ईश्वर ने धोखा दिया, ईश्वर बहुत मकर करने वाला है॥

—मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ ३। आ॰ ४६।५३॥

समीक्षक—जब मुसलमान लोग ख़ुदा के सिवाय दूसरी चीज़ नहीं मानते तो ख़ुदा ने किससे कहा? और उसके कहने से कौन हो गया? इसका उत्तर मुसलमान सात जन्म में भी न दे सकेंगे, क्योंकि विना उपादान कारण के कार्य कभी नहीं हो सकता। विना कारण के कार्य्य कहना जानो अपने माँ-बाप के विना मेरा शरीर हो गया ऐसी बात है। जो धोखा खाता और मकर अर्थात् छल और दम्भ करता है वह ईश्वर तो कभी नहीं हो सकता, किन्तु उत्तम मनुष्य भी ऐसा काम नहीं करता॥५४॥

५५. मत मरो, परन्तु मुसलमान हो॥ क्या तुम को यह बहुत न होगा कि अल्लाह तुम को तीन हज़ार फ़रिश्तों के साथ सहाय देवे॥

—मं॰ १। सि॰ ३। सू॰ ३। आ॰ ९३।१२३॥

समीक्षक—देखिये! इससे यह ठीक सिद्ध होता है कि मुसलमान न होगे, तो हम तुमको मार डालेंगे। यह केवल अधर्म की बात है। जो मुसलमानों को तीन हज़ार फ़रिश्तों के साथ सहाय देता था, तो अब मुसलमानों की पातशाही बहुत सी नष्ट हो गई और होती जाती है क्यों सहाय नहीं देता? इसलिये यह केवल लोभ देके मूर्खों को फसाने के लिये महा अन्याय की बात है॥५५॥

५६. और काफ़िरों पर हम को सहाय कर॥ अल्लाह तुम्हारा उत्तम सहायक और कारसाज है॥ जो तुम अल्लाह के मार्ग में मारे जाओ वा मर जाओ, अल्लाह की दया बहुत अच्छी है॥     —मं॰ १। सि॰ ४। सू॰ ३। आ॰ १४६।१४९।१५६॥

समीक्षक—देखिये मुसलमानों की मूर्खता! कि जो अपने मत से भिन्न हैं उनके मारने के लिये ख़ुदा की प्रार्थना करते हैं। क्या परमेश्वर भोला है जो इनकी बात मान लेवे? यदि मुसलमानों का कारसाज़ अल्लाह ही है, तो फिर मुसलमानों के कार्य्य नष्ट क्यों होते हैं? और ख़ुदा भी मुसलमानों के साथ मोह से फसा हुआ दीख पड़ता है। जो ऐसा पक्षपाती ख़ुदा है, तो धर्मात्मा पुरुषों का उपासनीय कभी नहीं हो सकता॥५६॥

५७. यह लड़ाई इसलिये कि अल्लाह तुम्हारी परीक्षा लेवे।

—मं॰ १। सि॰ ४। सू॰ ३। आ॰॥

समीक्षक—जो लड़ाई के विना परीक्षा नहीं कर सकता, तो वह सर्वज्ञ नहीं। इससे वह ईश्वर क्योंकर हो सके॥५७॥

५८. और अल्लाह तुम को सर्वज्ञ नहीं करता परन्तु अपने पैग़म्बरों में से जिसको चाहे पसन्द करे, बस अल्लाह और उसके रसूल के साथ ईमान लाओ॥

—मं॰ १। सि॰ ४। सू॰ ३। आ॰ १७९॥

समीक्षक—क्या किसी पैग़म्बर को ख़ुदा अपने सदृश कर सकता है? जो कर सकता है, तो दूसरा ख़ुदा शरीकख़ुदा हुआ। जो नहीं कर सकता तो इस आयत के झूंठ होने से ख़ुदा झूंठ बोला। जिसकी बात झूंठ हो, वह स्वयं झूंठा हुआ। जब मुसलमान लोग सिवाय ख़ुदा के न किसी के साथ ईमान लाते, न किसी को ख़ुदा का साझी मानते हैं तो ईमान में ख़ुदा के साथ पैग़म्बर साहेब को शरीक क्यों किया? अल्लाह ने पैगम्बर के साथ ईमान लाना लिखा, इसी से पैग़म्बर भी शरीक हो गया, पुनः लाशरीक कहना झूंठा हुआ॥५८॥

५९. ऐ ईमानवालो! सन्तोष करो, परस्पर थांबे रक्खो और लड़ाई में लगे रहो, अल्लाह से डरो कि तुम छुटकारा पाओ॥ —मं॰ १। सि॰ ४। सू॰ ३। आ॰ २००॥

समीक्षक—यह क़ुरान का ख़ुदा और पैग़म्बर दोनों लड़ाईबाज़ थे। जो लड़ाई की आज्ञा देता है वह शान्तिभंग करनेवाला होता है। क्या नाम मात्र ख़ुदा से डरने से छुटकारा पाया जाता है? वा अधर्मयुक्त लड़ाई आदि से डरने से? जो प्रथम पक्ष है तो डरना, न डरना बराबर, और जो द्वितीय पक्ष है, तो ठीक है॥५९॥

६०. यह अल्लाह की हद्दें हैं, जो अल्लाह और उसके रसूल का कहा मानेगा वह बहिश्त में पहुँचेगा जिनमें नहरें चलती हैं और यही बड़ा प्रयोजन है॥ जो अल्लाह की और उसके रसूल की आज्ञा भंग करेगा और उसकी हद्दों से बाहर हो जायगा वो सदैव रहने वाली दोज़ख़ की आग में जलाया जावेगा और उसके लिये ख़राब करने वाला काफ़िर है॥               —मं॰ १। सि॰ ४। सू॰ ४। आ॰ १३।१४॥

समीक्षक—जब ख़ुदा ही ने मुहम्मद साहेब पैग़म्बर को अपना शरीक कर लिया है और खुद क़ुरान ही में लिखा है तो मुसलमानों का लाशरीक ख़ुदा को कहना व्यर्थ है। और देखो! ख़ुदा पैग़म्बर साहेब के साथ कैसा फंसा है कि जिसने बहिश्त में रसूल का साझा कर दिया है। इस एक बात में भी स्वतन्त्र न रहा। ऐसी-ऐसी बातें ईश्वरोक्त पुस्तक में नहीं हो सकतीं॥६०॥

६१. और एक परमाणु की बराबर भी वह अन्याय नहीं करता और जो भलाई होवे उसको दुगुणा करे॥ इच्छा करो अपने हाथ मुख से पूछलो निश्चय अल्लाह क्षमा करने वाला है॥   —मं॰ १। सि॰ ५। सू॰ ४। आ॰ ४०।५६॥

समीक्षक—जो एक अणु भी अन्याय ख़ुदा नहीं करता तो पुण्य को दुगुणा क्यों देता और मुसलमान का पक्षपात क्यों करता, जीव को आप ही पापी क्यों बनाता, फिर दण्ड क्यों देता है? क्योंकि अधिक न्यून करने से अधिष्ठाता को भलाई-बुराई का फल मिलता है, आधीन को नहीं। जैसे सेना की लड़ाई में राजा को जय-पराजय रूप फल होता है, भृत्यों को नहीं। वैसे द्विगुण वा न्यून फल कर्मों का देवे तो ख़ुदा अधर्मी हो जावे॥६१॥

६२. अवश्य बहिश्त में भेजेंगे, जिनमें नहरें चलती हैं और उनके लिये पवित्र बीबियां हैं तथा सायेदार वृक्ष हैं, उसमें सदा रहेंगे॥

—मं॰ १। सि॰ ५। सू॰ ४। आ॰ ५७॥

समीक्षक—यह केवल अज्ञानियों को लोभ देकर मुहम्मद साहब ने फसाये हैं और आप भी स्त्रियों में आसक्त होंगे, नहीं तो ऐसी बातें क्यों कहते?॥६२॥

६३. बस उनको चाहिये ख़ुदा के मार्ग में लड़ें।। जो लोग ईमान लाये ख़ुदा के मार्ग में लड़ते हैं, जो काफिर हैं वे बुतों के मार्ग में लड़ते हैं। बस शैतान के मित्रों से लड़ो, निश्चय उसका धोखा निर्बल है, जो उनको भलाई पहुंचती है, तो कहते हैं कि यह अल्लाह की ओर से है और बुराई को तेरी ओर से बतलाते हैं, कह सब अल्लाह की ओर से है॥    —मं॰ १। सि॰ ५। सू॰ ४। आ॰ ७५।७७॥

समीक्षक—भला! ईश्वर के मार्ग में लड़ाई का क्या काम? और जो बुतपरस्त काफिर हैं, तो मुसलमान बडे़ बुतपरस्त होने से बड़े काफिर होते हैं। क्योंकि ये बुत्परस्त लोग छोटी-छोटी मूर्तियों के सम्मुख नमते और भक्ति करते हैं। वैसे ही मुसलमान लोग मक्का की जो एक बड़ी मस्जिद है, उसके सामने नमते हैं। जो कहें कि हम मस्जिद को ख़ुदा नहीं समझते और क़ुरान की आज्ञा है, इससे उधर को मुखमात्र करके ख़ुदा की बन्दगी करते हैं, अच्छा तो ये लोग भी पत्थर को ईश्वर नहीं समझते, किन्तु पत्थर में ईश्वर की भावना करके भक्ति करते हैं और इनको भी पुराण में वैसी आज्ञा व्यासजी जिनको लोग ईश्वरावतार मानते हैं उनकी है, कि तुम मूर्त्ति पूजो।

इसलिये बड़ी मस्जिद को ईश्वर की भक्ति में सामने रखने वाले मुसलमान बड़े बुत्परस्त और ये लोग छोटे बुतपरस्त हैं। जैसे कोई मनुष्य अपने घर में से बिल्ली को जब लों निकाले, तब लों उसके घर में ऊंट प्रविष्ट हो जाय, वैसी ही दशा मुहम्मद साहेब आदि मुसलमानों की है। क्योंकि बिल्ली के समान छोटी-छोटी पाषाणादि की मूर्त्तियों को तो फोड़-तोड़ के अपने घर में से निकाल दी, परन्तु ऊंट के समान मस्जिद हृदयरूपी घर में प्रविष्ट हो गई। इससे मुसलमान लोग बड़ी हानि को प्राप्त हो गये। जब ये बड़े बुतपरस्त हैं तो किस मुख से दूसरे छोटे बुतपरस्तों का खण्डन कर सकते हैं। हां! पहिले आप बुतपरस्ती को छोडे़ं, तो अन्य का खण्डन कर सकें॥६३॥

६४. जब तेरे पास से निकलते हैं तो तेरे विरुद्ध सोचते हैं, अल्लाह उनकी बात को लिखता है।। अल्लाह ने उनकी कमाई वस्तु के कारण से उनको उलटा किया, क्या तुम चाहते हो कि अल्लाह गुमराह किये हुये को मार्ग पर लावे, बस जिसको वह गुमराह करे उसको कदाचिदपि मार्ग न पावेगा॥

—मं॰ १। सि॰ ५। सू॰ ४। आ॰ ८०।८८॥

समीक्षक—जो अल्लाह बातों को लिख बहीखाता बनाता जाता है, तो सर्वज्ञ नहीं। और जो सर्वज्ञ है तो लिखने का क्या काम? और जो मुसलमान कहते हैं कि शैतान ही सब को बहकाने से दुष्ट हुआ है तो जब ख़ुदा ही जीवों को गुमराह करता है, तो ख़ुदा और शैतान में क्या भेद रहा? हां, इतना भेद कह सकते हैं कि ख़ुदा बड़ा शैतान, वह फरिश्ता छोटा शैतान, क्योंकि मुलसमानों का यही क़ौल है कि जो बहकाता है वही शैतान है, तो इस प्रतिज्ञा से ख़ुदा को भी शैतान बना दिया॥६४॥

६५. और अपने हाथों को न रोकें, तो उनको पकड़ लो और जहाँ पाओ मार डालो॥ मुसलमानों को मुसलमान का मारना योग्य नहीं, जो कोई अनजान से मार डाले बस एक गर्दन मुसलमान का छोड़ना है और खून बहा उन लोगों की ओर साई हुई जो उस क़ौम से होवें, तुम्हारे लिए दान कर देंगे, जो दुश्मन की क़ौम से हैं। और जो कोई मुसलमान को जान कर मार डाले वह सदैव काल दोज़ख़ में रहेगा उस पर अल्लाह का क्रोध और लानत है॥

—मं॰ १। सि॰ ५। सू॰ ४। आ॰ ९१।९२।९३॥

समीक्षक—अब देखिये महा पक्षपात की बात! कि जो मुसलमान न हो, जहाँ पाओ मार डालना और मुसलमानों को न मारना। भूल से मुसलमानों के मारने में प्रायश्चित्त और अन्य को मारने से बहिश्त मिलेगा ऐसे उपदेश को कुए में डालना चाहिए। ऐसे-ऐसे पुस्तक, ऐसे पैग़म्बर, ऐसा ख़ुदा और ऐसे मत से सिवाय हानि के लाभ कुछ भी नहीं। ऐसों का न होना अच्छा और ऐसे प्रामादिक मतों से बुद्धिमानों को अलग रह कर वेदोक्त सब बातों को मानना चाहिए क्योंकि उसमें असत्य किञ्चिन्मात्र भी नहीं है। और जो मुसलमान को मारे उसको दोज़ख़ मिले और दूसरे मतवाले कहते हैं कि मुसलमान को मारे तो स्वर्ग मिले, लिखा है। अब कहो इन दोनों मतों में से किसको मानें किसको छोडें़? किन्तु ऐसे मूढ़ प्रकल्पित मतों को छोड़ कर वेदोक्त मत स्वीकार करने योग्य सब मनुष्यों के लिये है कि जिसमें आर्य्य मार्ग अर्थात् श्रेष्ठ पुरुषों के मार्ग में चलना और दस्यु अर्थात् दुष्टों के मार्ग से अलग रहना लिखा है सर्वोत्तम है॥६५॥

६६. और शिक्षा प्रकट होने के पीछे जिसने रसूल से विरोध किया और मुसलमानों से विरुद्ध पक्ष किया, अवश्य हम उसको दोज़ख़ में भेजेंगे॥

—मं॰ १। सि॰ ५। सू॰ ४। आ॰ ११५॥

समीक्षक—अब देखिये ख़ुदा और रसूल की पक्षपात की बातें! मुहम्मद साहेब आदि समझते थे कि जो ख़ुदा के नाम से ऐसी हम न लिखेंगे तो अपना मज़हब न बढे़गा और पदार्थ न मिलेंगे, आनन्द भोग न होगा। इसी से विदित होता है कि वे अपने मतलब करने में पूरे थे और अन्य के प्रयोजन बिगाड़ने में। इससे ये अनाप्त थे! इनकी बात का प्रमाण आप्त विद्वानों के सामने कभी नहीं हो सकता॥६६॥

६७. जो अल्लाह रसूलों, फरिश्तों, किताबों के साथ कुफ्र करे निश्चय वह गुमराह है॥ निश्चय जो लोग काफ़िर थे और ईमान लाये पुनः फिर गये और कुफ्र में अधिक बढ़े, अल्लाह उन को कभी क्षमा न करेगा और न मार्ग दिखलावेगा॥

—मं॰ १। सि॰ ५। सू॰ ४। आ॰ १३६।१३७॥

समीक्षक—क्या अब भी ़ख़ुदा लाशरीक रह सकता है? क्या लाशरीक कहते जाना और उसके साथ बहुत से शरीक भी मानते जाना यह परस्पर विरुद्ध बात नहीं है? क्या तीन वार क्षमा के पश्चात् ख़ुदा क्षमा नहीं करता? और तीन वार कुफ्र करने पर रास्ता दिखलाता है? वा चौथी वार से आगे नहीं दिखलाता? यदि चार-चार वार भी कुफ्र सब लोग करें, तो कुफ्र बहुत ही बढ़ जावे॥६७॥

६८. निश्चय अल्लाह बुरे लोगों को और काफ़िरों को जमा करेगा दोज़ख़ में॥ निश्चय बुरे लोग धोखा देते हैं अल्लाह को और उनको वह धोखा देता है॥ ऐ ईमान वालो! मुसलमानों को छोड़ काफ़िरों को मित्र मत बनाओ॥

—मं॰ १। सि॰ ५। सू॰ ४। आ॰ १४०।१४२।१४४॥

समीक्षक—मुसलमानों के बहिश्त और अन्य लोगों के दोज़ख़ में जाने का क्या प्रमाण? वाह जी वाह! जो बुरे लोगों के धोखे में आता और अन्य को धोखा देता है ऐसा ख़ुदा हम से अलग रहे, किन्तु जो धोखेबाज़ हैं उनसे जाकर मेल करे और वे उससे मेल करें। क्योंकि—

“यादृशी शीतला देवी तादृशः खरवाहनः”

जैसे को वैसा मिले तभी निर्वाह होता है।

जिसका ख़ुदा धोखेबाज़ है उसके उपासक मुसलमान लोग धोखेबाज़ क्यों न हों? तभी तो मुसलमान लोग धोखा देने में तत्पर रहते होंगे। क्या दुष्ट मुसलमान हो उससे मित्रता और अन्य श्रेष्ठ, मुसलमान भिन्न से शत्रुता करना, किसी को उचित हो सकता है?॥६८॥

६९. ऐ लोगो! निश्चय तुम्हारे पास सत्य के साथ ख़ुदा की ओर से पैग़म्बर आया, बस तुम उन पर ईमान लाओ॥ अल्लाह माबूद अकेला है॥

—मं॰ १। सि॰ ६। सू॰ ४। आ॰ १७०।१७१॥

समीक्षक—क्या जब पैग़म्बरों पर ईमान लाना लिखा, तो ईमान में पैग़म्बर ख़ुदा का शरीक अर्थात् साझी हुआ वा नहीं? जब अल्लाह एकदेशी है, व्यापक नहीं, इसी से उसके पास से पैग़म्बर आते जाते हैं, तो वह ईश्वर भी नहीं हो सकता। कहीं सर्वदेशी लिखते हैं, कहीं एकदेशी। इससे विदित होता है कि क़ुरान एक का बनाया नहीं, किन्तु बहुतों ने मिलके बनाया है॥६९॥

७०. तुम पर हराम किया गया मुर्दार, लोहू, सूअर का मांस जिस पर अल्लाह के विना कुछ और पढ़ा जावे, गला घोटे, लाठी मारे, ऊपर से गिर पड़े, सींग मारे और गोश्त खाने वाले॥               —मं॰ २। सि॰ ६। सू॰ ५। आ॰ ३॥

समीक्षक—क्या इतने ही पदार्थ हराम हैं? अन्य बहुत से पशु तथा तिर्य्यक् जीव कीड़ी आदि मुसलमानों को हलाल होंगे? इसलिये यह मनुष्यों की कल्पना है, ईश्वर की नहीं। इससे इसका प्रमाण भी नहीं॥७०॥

७१. और अल्लाह को अच्छा उधार दो अवश्य मैं तुम्हारी बुराई दूर करूंगा और तुम्हें बहिश्त में भेजूंगा॥         —मं॰ २। सि॰ ६। सू॰ ५। आ॰ १२॥

समीक्षक—वाह जी! मुसलमानों के खुदा के घर में कुछ भी धन विशेष नहीं रहा होगा, जो विशेष होता तो उधार क्यों मांगता? और उनको क्यों बहकाता कि तुम्हारी बुराई छुड़ा के तुम को स्वर्ग में भेजूंगा? यहां विदित होता है कि खुदा के नाम से मुहम्मद साहेब ने अपना मतलब साधा है॥७१॥

७२. जिसको चाहता है पुण्यात्मा बनाता है जिसको चाहे पापात्मा बनाता है॥ जो कुछ किसी को भी न दिया वह तुम्हें दिया॥

—मं॰ २। सि॰ ६। सू॰ ५। आ॰ १८।२०॥

समीक्षक—जैसे शैतान जिसको चाहता पापी बनाता वैसे मुसलमानों का ख़ुदा भी शैतान का काम करता है? जो ऐसा है, तो फिर बहिश्त और दोज़ख़ में ख़ुदा जावे क्योंकि वह पाप पुण्य करने वाला हुआ; जीव पराधीन है। जैसी सेना सेनापति के आधीन रक्षा करती और किसी को मारती है, उसकी भलाई बुराई सेनापति को होती है, सेना पर नहीं॥७२॥

७३. काफिरों पर मत गम खा।      —मं॰ २। सि॰ ६। सू॰ ५। आ॰ २३॥

समीक्षक—क्या अधर्म और पक्षपात की बात है कि जो मुसलमान न हो उस पर गम न खाना और मुसलमानों पर गम खाना केवल अधर्म की बात है॥७३॥

७४. सेवा करो अल्लाह की और रसूल की, और रसूल का कहा मानो॥

—मं॰ २। सि॰ ७। सू॰ ५। आ॰ ९२॥

समीक्षक—देखिये! यह बात ख़ुदा के शरीक होने की है, फिर ख़ुदा को ‘लाशरीक’ मानना व्यर्थ है॥७४॥

७५. अल्लाह ने माफ़ किया जो हो चुका, और जो कोई फिर करेगा अल्लाह उससे बदला लेगा॥                 —मं॰ २। सि॰ ७। सू॰ ५। आ॰ ९५॥

समीक्षक—किये हुए पापों का क्षमा करना जानो पापों को करने की आज्ञा देके बढ़ाना है। पाप क्षमा करने की बात जिस पुस्तक में हो, वह न ईश्वर और न किसी विद्वान् का बनाया है, किन्तु पापवर्द्धक है। हां, आगामी पाप छुड़वाने के लिये किसी से प्रार्थना और स्वयं छोड़ने के लिये पुरुषार्थ, पश्चात्ताप करना उचित है परन्तु केवल पश्चात्ताप करते रहे, छोड़े नहीं, तो भी कुछ नहीं हो सकता॥७५॥

७६. और उस मनुष्य से अधिक पापी कौन है जो अल्लाह पर झूठ बांध लेता है और कहता है कि मेरी ओर वही की गई परन्तु वही उसकी ओर नहीं की गई और जो कहता है कि मैं भी उतारूंगा॥    —मं॰ २। सि॰ ७। सू॰ ६। आ॰ ९४॥

समीक्षक—इस बात से सिद्ध होता है कि जब मुहम्मद साहेब कहते थे कि मेरे पास ख़ुदा की ओर से आयतें आती हैं तब किसी दूसरे ने भी मुहम्मद साहेब के तुल्य लीला रची होगी कि मेरे पास भी आयतें उतरती हैं, मुझको भी पैगम्बर मानो। इसको हठाने के और अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये मुहम्मद साहेब ने यह उपाय किया होगा॥७६॥

७७. अवश्य हमने तुमको उत्पन्न किया, फिर तुम्हारी सूरतें बनाई, फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सिजदा करो, बस उन्होंने सिजदा किया परन्तु शैतान सिजदा करने वालों में से न हुआ॥ कहा जब मैंने तुझे आज्ञा दी फिर किसने रोका कि तूने सिजदा न किया, कहा मैं उससे अच्छा हूं, तूने मुझको आग से और उसको मिट्टी से उत्पन्न किया॥ कहा बस उसमें से उतर, यह तेरे योग्य नहीं है कि तू उसमें अभिमान करे॥ कहा उस दिन तक ढील दे कि क़ब्रों से उठाये जावें॥ कहा निश्चय तू ढील दिये गयों से है॥ कहा बस इसकी कसम है कि तूने मुझको गुमराह किया, अवश्य मैं उनके लिये तेरे सीधे मार्ग पर बैठूंगा॥ और प्रायः तू उनको धन्यवाद करने वाला न पावेगा॥ कहा उससे दुर्दशा के साथ निकल, अवश्य जो कोई उनमें से तेरा पक्ष करेगा तुम सबसे दोज़ख़ को भरूंगा॥

—मं॰ २। सि॰ ८। सू॰ ७। आ॰ ११।१२।१३।१४। १५।१६।१७।१८॥

समीक्षक—अब ध्यान देकर सुनो ख़ुदा और शैतान के झगड़े को! एक फ़रिश्ता जैसा कि चपरासी हो, था, वह भी ख़ुदा से न दबा और ख़ुदा उसके आत्मा को पवित्र भी न कर सका, फिर ऐसे बागी, जो पापी बना कर ग़दर करने वाला था उसको ख़ुदा ने छोड़ दिया। यह ख़ुदा की बड़ी भूल है। शैतान तो सब को बहकाने वाला और ख़ुदा शैतान को बहकाने वाला होने से यह सिद्ध होता है कि शैतान का भी शैतान ख़ुदा है। क्योंकि शैतान प्रत्यक्ष कहता है कि तूने मुझे गुमराह किया। इससे ख़ुदा में पवित्रता भी नहीं पाई जाती और सब बुराइयों का चलाने वाला मूल कारण ख़ुदा हुआ। ऐसा ख़ुदा मुसलमानों ही का ख़ुदा हो सकता है,अन्य श्रेष्ठ विद्वानों का नहीं। और फ़रिश्तों से मनुष्यवत् वार्त्तालाप करने से देहधारी, अल्पज्ञ, न्यायरहित मुसलमानों का ख़ुदा है, इसी से बुद्धिमान् लोग इसलाम के मज़हब को प्रसन्न नहीं करते॥७७॥

७८. निश्चय तुम्हारा मालिक अल्लाह है जिसने आसमानों और पृथिवी को छः दिन में उत्पन्न किया, फिर करार पकड़ा अर्श पर॥ दीनता से अपने मालिक को पुकारो॥                —मं॰ २। सि॰ ८। सू॰ ७। आ॰ ५४।५५॥

समीक्षक—भला! जो छः दिन में जगत् को बनावे, अर्श अर्थात् ऊपर के आकाश में सिंहासन पर आराम करे, वह ईश्वर सर्वशक्तिमान् और व्यापक कभी नहीं हो सकता। इनके न होने से वह ख़ुदा भी नहीं कहा सकता। क्या तुम्हारा ख़ुदा बधिर है जो पुकारने से सुनता है? ये सब बातें अनीश्वरकृत हैं, इससे क़ुरान ईश्वरकृत नहीं हो सकता। यदि छः दिनों में जगत् बनाया, सातवें दिन अर्श पर आराम किया तो थक भी गया होगा और अब तक सोता है वा जागा है? यदि जागता है तो अब कुछ काम करता है वा निकम्मा सैल सपट्टा करता, ऐश करता फिरता है॥७८॥

७९. मत फिरो पृथिवी पर झगड़ा करते॥ —मं॰ २। सि॰ ८। सू॰ ७। आ॰ ७४॥

समीक्षक—यह बात तो अच्छी है परन्तु इस से विरुद्ध जिहाद करना और काफ़िरों को मारना भी लिखा है, अब कहो यह पूर्वापर विरुद्ध नहीं है? इससे यह विदित होता है कि जब मुहम्मद साहेब निर्बल हुए होंगे तब यह उपाय रचा होगा और जब सबल हुए होंगे, झगड़ा मचाया होगा। इन्हीं से ये बातें झूठी हैं॥७९॥

८०. बस एक ही वार अपना असा डाल दिया और वह अजगर था प्रत्यक्ष॥

—मं॰ २। सि॰ ९। सू॰ ७। आ॰ १०७॥

समीक्षक—अब इसके लिखने से विदित होता है कि ऐसी झूठी बातों को ख़ुदा और मुहम्मद साहेब भी मानते थे। जो ऐसा है तो ये दोनों विद्वान् नहीं थे, क्योंकि जैसे आँख से देखने और कान से सुनने को अन्यथा कोई नहीं कर सकता! इसी से ये इन्द्रजाल की बातें हैं॥८०॥

८१. अवश्य हम क़तल करेंगे बेटों उनके को और जीती रक्खेंगे बीबियों उनकी को।। बस हमने उन पर मेह का तूफ़ान भेजा, टीढ़ी, चिचड़ी और मेंडक और लोहू॥ बस उनसे हम ने बदला लिया और उन को डुबो दिया दरियाव में॥ और हमने बनी इसराईल को दरियाव से पार उतार दिया॥ निश्चय वह दीन झूंठा है कि जिसमें वे हैं और उनका कार्य्य भी झूठा है॥

—मं॰ २। सि॰ ९। सू॰ ७। आ॰ १२७। १३३। १३६।१३८। १३९॥

समीक्षक—भला! जो लड़काओं को क़तल करे और स्त्रियों को जीता रक्खे, उससे निर्दय, राक्षस स्वभावयुक्त, विषयासक्त मनुष्य और दुष्टमत दूसरा कोई भी न होगा। और देखिये जैसा कोई पाखंडी किसी को डरावे कि हम तेरे पर सर्पों को काटने के लिये भेज देंगे, ऐसी ही यह भी बात है। भला! जो ऐसा पक्षपाती कि एक जाति को डुबा दे और दूसरी को पार उतारे यह पक्षपाती, मतलबी के समान ख़ुदा क्यों नहीं? जो दूसरे मत को कि जिसमें हज़ारों क्रोड़ों मनुष्य हों, झूठा बतलावे और अपने को सच्चा, उससे परे झूठा दूसरा मत कौन हो सकता है? क्योंकि किसी मत में सब मनुष्य बुरे और भले नहीं हो सकते। यह इक्तर्फी डिगरी करना महामूर्खों का काम है। क्या तौरेत ज़बूर का दीन, जो कि उनका था, क्योंकर अपने किये को ख़ुदा ने झूठा किया? वा उनका कोई अन्य मज़हब था कि जिसको झूठा कहा और जो वह अन्य मज़हब था, तो कौन सा था, कहो कि जिसका नाम क़ुरान में हो॥८१॥

८२. बस तू मुझ को अवश्य देख सकेगा, जब प्रकाश किया उसके मालिक ने पहाड़ की ओर उसको परमाणु-परमाणु किया, गिर पड़ा मूसा बेहोश॥

—मं॰ २। सि॰ ९। सू॰ ७। आ॰ १४३॥

समीक्षक—जो देखने में आता है वह व्यापक नहीं हो सकता। और ऐसे चमत्कार करता फिरता था तो ख़ुदा इस समय ऐसा चमत्कार किसी को क्यों नहीं दिखलाता? सर्वथा विद्या विरुद्ध होने से यह बात मानने योग्य नहीं॥८२॥

८३. यह कि मार सात असा अपने के पत्थर को, बस फूट निकले बारह चश्मे॥                            —मं॰ २। सि॰ ९। सू॰ ७। आ॰ १६०॥

समीक्षक—अब देखिये! बढकर भानुमती के सी ख़ुदा की ख़ुदाई, पैग़म्बर की पैग़म्बराई। इसको कोई भी बुद्धिमान् लोग सच नहीं मान सकते, सिवाय जंगली मनुष्यों के॥८३॥

८४. और अपने मालिक को दीनता, डर से मन में याद कर, हल्के धीमे शब्द के वाज़ से सुबह को और शाम को॥    —मं॰ २। सि॰ ९। सू॰ ७। आ॰ २०५॥

समीक्षक—कहीं-कहीं क़ुरान में लिखा [है] कि बड़े वाज़ से अपने मालिक को पुकार, कहीं-कहीं धीरे-धीरे मन में ईश्वर का स्मरण कर। अब कहिये! कौन-सी बात सच्ची और कौन-सी झूठी? जो एक दूसरी बात से विरोध करती है वह बात प्रमत्त गीत के समान होती है। यदि कोई बात भ्रम से विरुद्ध निकल जाय, उसको मान ले, तो कुछ चिन्ता नहीं॥८४॥

८५. प्रश्न करते हैं तुझको लूटों से कहें लूटें वास्ते अल्लाह के और रसूल के और डरो अल्लाह से डरो थप्पड़ लात से॥ —मं॰ २। सि॰ ९। सू॰ ८। आ॰ १॥

समीक्षक—जो लूट मचावें, डाकू के कर्म करें, करावें और ख़ुदा तथा पैग़म्बर और ईमानदार भी बनें, यह बड़े आश्चर्य की बात है और अल्लाह का डर बतलाते और डाकादि बुरे काम भी करते जायें और ‘उत्तम मत हमारा है’ कहते लज्जा भी नहीं। हठ छोड़ के सत्य वेदमत का ग्रहण न करें इससे अधिक बुराई दूसरी कौन-सी होगी?॥८५॥

८६. और काटें जड़ काफिरों की॥ मैं तुमको सहाय दूंगा। साथ सहस्र फ़रिश्तों के पीछे-पीछे आने वाले॥ अवश्य मैं काफ़िरों के दिलों में भय डालूंगा, बस मारो ऊपर गर्दनों के, मारो उन में से हर पोरी (सन्धि) पर॥

—मं॰ २। सि॰ ९। सू॰ ८। आ॰ ७।९।१२॥

समीक्षक—वाह जी वाह! कैसा ख़ुदा और कैसे पैग़म्बर दयाहीन। जो मुसलमानी मत से भिन्न काफ़िरों की जड़ कटवावे। और ख़ुदा आज्ञा देवे उनको गर्दन मारो और पग की नस को काटने का सहाय और सम्मति देवे। भला! ऐसा ख़ुदा लंकेश से क्या कुछ कम है? यह सब प्रपञ्च क़ुरानकर्त्ता का है, ख़ुदा का नहीं। यदि ख़ुदा का हो, तो ऐसा ख़ुदा हम से दूर और हम उससे दूर रहें॥८६॥

८७. अल्लाह मुसलमानों के साथ है॥ ऐ लोगो जो ईमान लाये हो पुकारना स्वीकार करो वास्ते अल्लाह के और वास्ते रसूल के॥ ऐ लोगो जो ईमान लाये हो मत चोरी करो अल्लाह की रसूल की और मत चोरी करो अमानत अपनी को॥ और मकर करता था अल्लाह और अल्लाह भला मकर करने वालों का है॥

—मं॰ २। सि॰ ९। सू॰ ८। आ॰ १९।२४।२७।३०॥

समीक्षक—क्या अल्लाह मुसलमानों का पक्षपाती है? जो ऐसा है तो अधर्म करता है। नहीं तो ईश्वर सब सृष्टि भर का है। क्या ख़ुदा विना पुकारे नहीं सुन सकता? बधिर है? और उसके साथ रसूल को शरीक करना बहुत बुरी बात नहीं है? क्या अल्लाह का कौन सा खज़ाना भरा है जो चोरी करेगा कोई? क्या रसूल और अपनी अमानत की चोरी छोड़ कर अन्य सब की चोरी किया करे? ऐसा उपदेश अविद्वान् और अधर्मियों का हो सकता है। भला! जो मकर करता और जो मकर करने वालों का संगी है, वह ख़ुदा कपटी छली और अधर्मी क्यों नहीं? इसीलिये यह क़ुरान ख़ुदा का बनाया हुआ नहीं है, किसी कपटी छली का बनाया होगा, नहीं तो ऐसी अन्यथा बातें लिखित क्यों होतीं?॥८७॥

८८. और लड़ो उनसे यहां तक कि न रहे फितना अर्थात् बल काफ़िरों का और होवे दीन तमाम वास्ते अल्लाह के।। और जानो तुम यह कि जो कुछ तुम लूटो किसी वस्तु से निश्चय वास्ते अल्लाह के है पांचवां हिस्सा उसका और वास्ते रसूल के निश्चय मैं तुम्हारा पक्षी हूँ॥

—मं॰ २। सि॰ ९। सू॰ ८। आ॰ ३९।४१।४८॥

समीक्षक—ऐसा अन्याय से लड़ाका और लड़ने-लड़ानेवाला मुसलमानों के ख़ुदा से शान्तिभङ्गकर्त्ता दूसरा कौन होगा? अब देखिये यह मज़हब कि अल्लाह और रसूल के लिये सब जगत् को लूटना लुटवाना लुटेरों का सा काम नहीं है? और लूट के माल में ख़ुदा का हिस्सेदार बनना जानो डाकू बनना है और ऐसे लुटेरों का पक्षपाती बनना ख़ुदा अपनी ख़ुदाई में बट्टा लगाता है। बड़े आश्चर्य की बात है ऐसा पुस्तक, और ऐसा ख़ुदा, ऐसे ख़ुदा की ओर के पैग़म्बर और ऐसा उपाधिखोर मजहब संसार में महाशान्तिभङ्ग करके दुःखदायी कहां से हुआ? जो ऐसे-ऐसे मत जगत् में प्रचलित न होते तो सब जगत् आनन्द में बना रहता॥८८॥

८९. और कभी देखे जब काफ़िरों को फ़रिश्ते कब्ज करते हैं मारते हैं मुख उनके और पीठें उनकी और कहते चखो ़अज़ाब जलने का॥ हमने उनके पाप से उनको मारा और हमने फ़िराओन की क़ौम को डुबा दिया॥ और तैयारी करो वास्ते उनके जो कुछ तुम कर सको॥

—मं॰ २। सि॰ १०। सू॰ ८। आ॰ ५०।५४।६०॥

समीक्षक—क्योंजी! आजकल रूस ने रूम आदि और इङ्गलैण्ड ने मिश्र की दुर्दशा कर डाली, फ़रिश्ते कहां सो गये? और अपने सेवकों के शत्रुओं को ख़ुदा पूर्व मारता डुबाता था, यह बात सच्ची हो, तो आज कल भी ऐसा करे, जिससे ऐसा नहीं होता इसलिये यह बात मानने योग्य नहीं।। अब देखिये! यह कैसी बुरी आज्ञा है कि जो कुछ तुम कर सको वह भिन्न मत वालों के लिये दुःखदायक कर्म करो, ऐसी आज्ञा विद्वान् और धार्मिक दयालु की नहीं हो सकती। फिर लिखते हैं कि ख़ुदा दयालु और न्यायकारी है। ऐसी बातों से मुसलमानों के ख़ुदा से न्याय और दयादि सद्गुण दूर बसते हैं॥८९॥

९०. ऐ नबी किफ़ायत है तुझ को अल्लाह और उनको जिन्होंने मुसलमानों से तेरा पक्ष किया॥ ऐ नबी रग़बत अर्थात् चाह चस्का दे मुसलमानों को ऊपर लड़ाई के, जो हों तुम में से २० आदमी सन्तोष करने वाले तो पराजय करें दो सौ का॥ बस खाओ उस वस्तु से कि लूटा है तुमने हलाल पवित्र और डरो अल्लाह से वह क्षमा करने वाला दयालु है॥ —मं॰ २। सि॰ १०। सू॰ ८। आ॰ ६४।६५।६९॥

समीक्षक—भला! यह कौनसी न्याय, विद्वत्ता और धर्मात्मता की बात है कि जो अपना पक्ष करे और चाहे अन्याय भी करे उसी का पक्ष और लाभ ख़ुदा पहुंचावे? और जो प्रजा में शान्तिभंग करके लड़ाई करे करावे और लूट मार के पदार्थों को हलाल बतलावे और फिर उसी का नाम क्षमावान् दयालु लिखे, यह बात ख़ुदा की तो कभी नहीं हो सकती। किन्तु किसी भले आदमी की भी नहीं हो सकती। ऐसी-ऐसी बातों से क़ुरान ईश्वरवाक्य कभी नहीं हो सकता॥९०॥

९१. सदा रहेंगे बीच उसके अल्लाह समीप है उसके पुण्य बड़ा॥ ऐ लोगो! जो ईमान लाये हो मत पकड़ो बापों अपने को और भाइयों अपने को मित्र जो दोस्त रक्खें कुफ्र को ऊपर ईमान के॥ फिर उतारी अल्लाह ने तसल्ली अपनी ऊपर रसूल अपने के और ऊपर मुसलमानों के और उतारे लश्कर नहीं देखा तुमने उनको और अज़ाब किया उन लोगों को और यही सजा है काफ़िरों को।। फिर-फिर आवेगा अल्लाह पीछे उसके ऊपर और लड़ाई करो उन लोगों से जो ईमान नहीं लाते॥          —मं॰ २। सि॰ १०। सू॰ ९। आ॰ २२।२३।२६।२७।२९॥

समीक्षक—भला! जो बहिश्तवालों के समीप अल्लाह रहता है तो सर्वव्यापक नहीं हो सकता, जो सर्वव्यापक नहीं तो सृष्टिकर्त्ता और न्यायाधीश नहीं हो सकता। और अपने मा, बाप, भाई और मित्रों को छुड़वाना केवल अन्याय की बात है, हां जो वे बुरा उपदेश करें, न मानना परन्तु उनकी सेवा सदा करना चाहिये। जो पहिले ख़ुदा मुसलमानों पर सन्तोषी था और उसके सहाय के लिये लश्कर उतारता था, सच हो, तो अब ऐसा क्यों नहीं करता? और जो प्रथम काफ़िरों को दण्ड देता और पुनः पुनः उसके ऊपर आता था, तो अब कहां गया? क्या विना लड़ाई के ईमान को ख़ुदा नहीं बना सकता? ऐसे ख़ुदा को हमारी ओर से सदा तिलांजलि है, ख़ुदा क्या है, एक खिलाड़ी है?॥९१॥

९२. बस मत अन्याय करो बीच उसके आपस में और लड़ो मुशरिकों से इकट्ठे जैसा लड़ते हैं।। और हम बाट देखने वाले हैं वास्ते तुम्हारे यह कि पहुंचावे तुम को अल्लाह अज़ाब अपने पास से वा हमारे हाथों से॥

—मं॰ २। सि॰ १०। सू॰ ९। आ॰ ३६।५२॥

समीक्षक—क्या मुसलमान लोग आपस में न्याय और दूसरों में अन्याय करना धर्म समझते हैं। और ऐसा है, तो मुसलमान लोग अन्याय की मूर्तियाँ हैं। क्या मुसलमान ही ईश्वर की पुलिस बन गये हैं कि अपने हाथ वा मुसलमानों के हाथ से अन्य किसी मत वालों को दण्ड देता है? क्या दूसरे करोड़ों मनुष्य ईश्वर को अप्रिय हैं? मुसलमानों में पापी भी प्रिय है? इसलिये अन्धेर नगरी गवरगण्ड राज की सी व्यवस्था दीखती है। आश्चर्य है कि जो बुद्धिमान् मुसलमान हैं, वे भी इस निर्मूल अयुक्त मत को मानते हैं॥९२॥

९३. प्रतिज्ञा की है अल्लाह ने ईमान वालों से और ईमानवालियों से बहिश्तें चलती हैं नीचे उनके से नहरें सदैव रहने वाली बीच उसके और घर पवित्र बहिश्तों अदन के और प्रसन्नता अल्लाह की ओर बड़ी है और यह कि वह है मुराद खाना बड़ा॥ बस ठट्ठा करते हैं उनसे, ठट्ठा किया है अल्लाह ने उन से॥

—मं॰ २। सि॰ १०। सू॰ ९। आ॰ ७२।७९॥

समीक्षक—यह ख़ुदा की ओर से स्त्री पुरुषों को लोभ देना है अपने मतलब के लिये। क्योंकि जो ऐसा प्रलोभन न देते तो कोई मुहम्मद साहेब के जाल में न फसता, ऐसे ही अन्य मत वाले भी किया करते हैं। भला! मनुष्य लोग तो आपस में ठट्ठा किया ही करते हैं, परन्तु ख़ुदा को किसी से ठट्ठा करना उचित नहीं है। यह क़ुरान ग्रन्थ क्या है, बड़ा खेल है॥९३॥

९४. परन्तु रसूल और जो लोग कि साथ उसके ईमान लाये जिहाद किया उन्होंने साथ धन अपने के तथा जान अपनी के और इन्हीं लोगों के लिये भलाई है॥ और मोहर रक्खी अल्लाह ने ऊपर दिलों उनके के, बस वे नहीं जानते॥

—मं॰ २। सि॰ १०। सू॰ ९। आ॰ ८८।९३॥

समीक्षक—अब देखिये मतलबसिन्धु की बात! कि वे ही भले हैं जो मुहम्मद साहेब के साथ ईमान लाये और जो नहीं लाते, वे बुरे हैं! क्या यह बात पक्षपात और अविद्या से भरी हुई नहीं है? जब ख़ुदा ने मोहर ही लगा दी, तो उनका अपराध पाप करने में कोई भी नहीं, किन्तु ख़ुदा ही का अपराध है, क्योंकि उन बिचारों को भलाई से दिलों पर मोहर लगा के रोक दिये, यह कितना बड़ा अन्याय है!॥९४॥

९५. ले माल उनके से खैरात कि पवित्र करे तू उनको और शुद्ध करे तू उन को साथ उसके अर्थात् गुप्त में॥ निश्चय अल्लाह ने मोल ली हैं मुसलमानों से जानें उनकी और धन उनके बदले; कि वास्ते उनके बहिश्त है, लड़ेंगे बीच मार्ग अल्लाह के बस मारेंगे और मर जावेंगे॥  —मं॰ २। सि॰ ११। सू॰ ९। आ॰ १०३।१११॥

समीक्षक—वाह जी वाह मुहम्मद साहेब! आपने तो गोकुलिये गुसाइयों की बराबरी कर ली क्योंकि उनका माल लेना और उनको गुप्त में पवित्र करना यही बात तो गुसाइयों की है। वाह ख़ुदा जी! आपने अच्छी सौदागरी की लगाई कि मुसलमानों के हाथ से अन्य गरीबों के प्राण लेना ही लाभ समझा और उन अनाथों को मरवा कर उन निर्दयी मनुष्यों को स्वर्ग देने से, दया और न्याय से मुसलमानों का ख़ुदा हाथ धो बैठा और अपनी खुदाई में बट्टा लगा के बुद्धिमान् धार्मिकों में घिनित (घृणित) हो गया॥९५॥

९६. ऐ लोगो! जो ईमान लाये हो लड़ो उन लोगों से कि पास तुम्हारे हैं काफ़िरों से और चाहिए कि पावें बीच तुम्हारे सख्ती॥ क्या नहीं देखते यह कि वे बलाओं में डाले जाते हैं बीच हर वर्ष के एक वार वा दो वार, फिर वे नहीं तोबा करते और न वे शिक्षा पकड़ते हैं॥      —मं॰ २। सि॰ ११। सू॰ ९। आ॰ १२३।१२६॥

समीक्षक—देखिये! यह भी एक विश्वासघात की बातें ख़ुदा मुसलमानों को सिखलाता है कि चाहे पड़ोसी हों वा किसी के नौकर हों, जब अवसर पावें, तभी लड़ाई वा घात करें। ऐसी बातें मुसलमानों से बहुत बन गई हैं इसी क़ुरान के लेख से। अब तो मुसलमान समझ के इन क़ुरानोक्त बुराइयों को छोड़ दें, तो बहुत अच्छा है॥९६॥

९७. निश्चय पर्वर्दगार तुम्हारा अल्लाह है जिसने पैदा किया आसमानों और पृथिवी को बीच छः दिन के फिर क़रार पकड़ा ऊपर अर्श के तदबीर करता है काम की॥                    —मं॰ ३। सि॰ ११। सू॰ १०। आ॰ ३॥

समीक्षक—क्या अल्लाह तुम्हारी नित्य सेवा करता है? आसमान आकाश एक और विना बनाया हुआ अनादि है। उसका बनाना लिखने से निश्चय हुआ कि वह क़ुरान का कर्त्ता पदार्थ विद्या को नहीं जानता था? क्या परमेश्वर के सामने छः दिन तक बनाना पड़ता है? तो जो “हो मेरे हुक्म से और हो गया” जब क़ुरान में ऐसा लिखा है फिर छः दिन कभी नहीं लग सकते। इससे छः दिन लगना झूठ है। जो वह व्यापक होता, तो ऊपर अर्श के क्यों ठहरता? और जब तदबीर करता है काम की तो ठीक तुम्हारा ख़ुदा मनुष्य के समान है, क्योंकि जो सर्वज्ञ है, वह बैठा-बैठा तदबीर क्या करेगा? इससे विदित होता है कि ईश्वर को न जाननेवाले जंगली लोगों ने यह पुस्तक बनाया होगा॥९७॥

९८. शिक्षा और दया वास्ते मुसलमानों के॥

—मं॰ ३। सि॰ ११। सू॰ १०। आ॰ ५७॥

समीक्षक—क्या यह ख़ुदा मुसलमानों ही का है? दूसरों का नहीं? और पक्षपाती है जो मुसलमानों पर ही दया करे, अन्य मनुष्यों पर नहीं । यदि मुसलमान ईमानदारों को कहते हैं, तो उनके लिये शिक्षा की आवश्यकता ही नहीं और मुसलमानों से भिन्नों को उपदेश नहीं करता, तो ख़ुदा की विद्या ही व्यर्थ है॥९८॥

९९. और था अर्श अर्थात् सिंहासन उसका ऊपर पानी के तौकि परीक्षा लेवे तुम को, कौन तुम में से अच्छा है कर्मों में, जो कहे तू, अवश्य उठाये जाओगे तुम पीछे मृत्यु के॥                     —मं॰ ३। सि॰ १२। सू॰ ११। आ॰ ७॥

समीक्षक—जब पानी पर ख़ुदा का सिंहासन है, तो वह एकदेशी होने से ख़ुदा ही नहीं बन सकता और जब कर्मों की परीक्षा करता है, तो सर्वज्ञ ही नहीं। और जो मृत्यु पीछे उठाता है, तो दौड़ासुपुर्द रखता है और अपने नियम जोकि ‘मरे हुए न जीवें’, तोड़ता है। यह ख़ुदा को बट्टा लगता है॥९९॥

१००. और कहा गया ऐ पृथिवी अपना पानी निगल जा और ऐ आसमान बस कर और पानी सूख गया॥ और ऐ क़ौम मेरे, यह है निशानी ऊंटनी अल्लाह की वास्ते तुम्हारे, बस छोड़ दो उसको बीच पृथिवी अल्लाह के खाती फिरे॥

—मं॰ ३। सि॰ १२। सू॰ ११। आ॰ ४४।६४॥

समीक्षक—क्या लड़केपन की बात है! पृथिवी और आकाश कभी बात सुन सकते हैं? वाहजी वाह! ख़ुदा के ऊंटनी भी है, तो ऊंट भी होगा? तो हाथी, घोड़ा, गधा आदि भी होंगे? और ख़ुदा का ऊंटनी से खेत खिलाना क्या अच्छी बात है? क्या ऊंटनी पर चढ़ता भी है? जो ऐसी बातें हैं तो नवाबी की सी घसड़-पसड़ ख़ुदा के घर में भी हुई॥१००॥

१०१. और सदैव रहने वाले बीच उसके जब तक कि रहें आसमान और पृथिवी॥ और जो लोग सुभागी हुए बस बहिश्त के सदा रहने वाले हैं जब तक रहें आसमान और पृथिवी॥       —मं॰ ३। सि॰ १२। सू॰ ११। आ॰ १०७।१०८॥

समीक्षक—जब दोज़ख और बहिश्त में कयामत के पश्चात् सब लोग जायेंगे फिर आसमान और पृथिवी किसलिये रहेगी? और जब दोज़ख और बहिश्त [की], आसमान-पृथिवी के रहने तक अवधि हुई तो ‘सदा रहेंगे बहिश्त वा दोज़ख़ में,’ यह बात झूठी हुई। ऐसा कथन अविद्वानों का होता है, ईश्वर वा विद्वानों का नहीं॥१०१॥

१०२. जब यूसुफ़ ने अपने बाप से कहा कि ऐ बाप मेरे! मैंने एक स्वप्न देखा॥                      —मं॰ ३। सि॰ १२। सू॰ १२। आ॰ ४ से ५७ तक॥

समीक्षक—इस प्रकरण में पिता पुत्र का संवादरूप किस्सा कहानी भरी है, इसलिये क़ुरान ईश्वर का बनाया नहीं। किसी मनुष्य ने मनुष्यों का इतिहास लिख दिया है॥१०२॥

१०३. अल्लाह वह है जिसने खड़ा किया आसमानों को विना खंभे के देखते हो तुम उसको, फिर आराम किया ऊपर अर्श के अर्थात् स्वर्ग में, आज्ञा वर्तने वाला किया सूरज और चांद को॥ और वही है जिसने बिछाया पृथिवी को।। उतारा आसमान से पानी बस बहे नाले साथ अन्दाजे के॥ अल्लाह खोलता है भोजन को वास्ते जिसको चाहै और तंग करता है॥

—मं॰ ३। सि॰ १३। सू॰ १३। आ॰ २।३।१७।२६॥

समीक्षक—मुसलमानों का ख़ुदा पदार्थविद्या कुछ भी नहीं जानता था। जो जानता तो आसमान को खंभा लगाने की कथा कहनी, गुरुत्व न होने से, कुछ भी आवश्यकता न थी। यदि ख़ुदा स्वर्गरूप एक स्थान में रहता है, तो वह सर्वशक्तिमान् और सर्वव्यापक नहीं हो सकता। और जो ख़ुदा मेघविद्या जानता तो ‘आकाश से पानी उतारा’ लिखा, पुनः यह क्यों न लिखा कि ‘पृथिवी से पानी ऊपर चढ़ाया’। इससे निश्चय हुआ कि क़ुरान का बनाने वाला मेघ की विद्या को भी नहीं जानता था। और जो विना अच्छे बुरे कामों के सुख दुःख देता है, तो पक्षपाती अन्यायकारी निरक्षर भट्ट है॥१०३॥

१०४. कह निश्चय अल्लाह गुमराह करता है जिसको चाहता है और मार्ग दिखलाता है तर्फ अपनी उस मनुष्य को रुजू करता है॥

—मं॰ ३। सि॰ १३। सू॰ १३। आ॰ २७॥

समीक्षक—जब अल्लाह गुमराह करता है, तो ख़ुदा और शैतान में क्या भेद हुआ? जब कि शैतान दूसरों को गुमराह अर्थात् बहकाने से बुरा कहाता है तो ख़ुदा भी वैसे ही काम करने से बुरा शैतान क्यों नहीं? और बहकाने के पाप से दोज़खी क्यों नहीं होना चाहिये?॥१०४॥

१०५. इसी प्रकार उतारा हमने इस क़ुरान को अरबी [में] जो पक्ष करेगा तू उनकी इच्छा का पीछे इसके आई तेरे पास विद्या से॥ बस सिवाय इसके नहीं कि ऊपर तेरे पैग़ाम पहुंचाना है और ऊपर हमारे है हिसाब लेना॥

—मं॰ ३। सि॰ १३। सू॰ १३। आ॰ ३७।४०॥

समीक्षक—क़ुरान किधर की ओर से उतारा? क्या ख़ुदा ऊपर रहता है? जो यह बात सच है तो वह एकदेशी होने से ईश्वर ही नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर सब ठिकाने एकरस व्यापक है। पैग़ाम पहुँचाना हरकारे का काम है और हरकारा की आवश्यकता उसी को होती है, जो मनुष्यवत् एकदेशी हो। और हिसाब लेना देना भी मनुष्य का काम है, ईश्वर का नहीं, क्योंकि वह सर्वज्ञ है। यह निश्चय होता है कि किसी अल्पज्ञ मनुष्य का बनाया क़ुरान है॥१०५॥

१०६. और किया सूर्य चन्द्र को सदैव फिरने वाले॥ निश्चय आदमी अवश्य अन्याय और पाप करने वाला है॥ —मं॰ ३। सि॰ १३। सू॰ १४। आ॰ ३३।३४॥

समीक्षक—क्या चन्द्र सूर्य सदा फिरते और पृथिवी नहीं फिरती? जो पृथिवी नहीं फिरे तो कई वर्षों का दिन रात होवे। और जो मनुष्य निश्चय अन्याय और पाप करने वाला है तो क़ुरान से शिक्षा करनी व्यर्थ है। क्योंकि जिनका स्वभाव पाप ही करने का है, तो उनमें पुण्यात्मता कभी न होगी और संसार में पुण्यात्मा और पापात्मा सदा दीखते हैं, इसलिये ऐसी बात ईश्वरकृत पुस्तक की नहीं हो सकती। और निश्चय, अवश्य ये दोनों शब्द एकार्थ होने से पुनरुक्त हैं। पुनरुक्त प्रमत्त वाक्य होता है॥१०६॥

१०७. ये आयतें हैं किताब की और क़ुरान कहने वाले की और अवश्य निश्चय किये हमने बीच आसमान में बुर्जे बस जब ठीक करूँ मैं उसको और फूंक दूं बीच उसके रूह अपनी से, बस गिर पड़ा वास्ते उसके सिजदा करते हुए॥ कहा ऐ रब मेरे, इस कारण कि गुमराह किया तूने मुझ को, अवश्य जीनत दूंगा मैं वास्ते उनके बीच पृथिवी के, और गुमराह करूंगा॥

—मं॰ ३। सि॰ १४। सू॰ १५। आ॰ १, १६, २९।३९ से ४६ तक॥

समीक्षक—जो ख़ुदा ने अपनी रूह आदम साहेब में डाली, तो वह भी ख़ुदा हुआ और जो वह ख़ुदा न था, तो सिजदा अर्थात् नमस्कारादि भक्ति करने में अपना शरीक क्यों किया? जब शैतान को गुमराह करने वाला ख़ुदा ही है, तो वह शैतान का भी शैतान बड़ा भाई, गुरु क्यों नहीं? क्योंकि तुम लोग बहकाने वाले को शैतान मानते हो, तो ख़ुदा ने भी शैतान को बहकाया और प्रत्यक्ष शैतान ने कहा कि मैं बहकाऊंगा फिर भी उस को दण्ड देकर क़ैद क्यों न किया? और मार क्यों न डाला?॥१०७॥

१०८. उत्पन्न किया आदमी को शुक्र से बस एक ही वार और निश्चय भेजे हमने बीच हर उम्मत के पैग़म्बर॥ जब चाहते हैं हम उसको, यह कहते हैं हम उसको, हो। बस हो जाती है॥      —मं॰ ३। सि॰ १४। सू॰ १६। आ॰ ३६।४०॥

समीक्षक—इससे एक जन्म सिद्ध होता है, परन्तु इसमें बड़ी भारी भूल है, क्योंकि जन्म अनेक होते हैं। जब जीव अनादि हैं तो उनके गुण, कर्म, स्वभाव भी अनादि हैं, उसका फल भोग भी अनादि से चला आता है, पश्चात् एक जन्म का मानना व्यर्थ है इसका विशेष संवाद नवम समुल्लास में देख लेना। जो सब क़ौमों पर पैग़म्बर भेजे हैं, तो सब लोग जो कि पैग़म्बर की राय पर चलते हैं, वे काफ़िर क्यों? क्या दूसरे पैग़म्बर का मान्य नहीं सिवाय तुम्हारे पैग़म्बर के? यह सर्वथा पक्षपात की बात है। जो सब देश में पैग़म्बर भेजे, तो आर्य्यावर्त में कौन सा भेजा? इसलिए यह बात मानने योग्य नहीं। जब ख़ुदा चाहता है और कहता है कि पृथिवी हो जा। वह जड़ कभी नहीं सुन सकती, ख़ुदा का हुक्म क्योंकर बजा सकेगी? और सिवाय ख़ुदा के दूसरी चीज नहीं मानते तो सुना किसने? और हो कौन गया? ये सब अविद्या की बातें हैं, ऐसी बातों को मूढ लोग मानते हैं॥१०८॥

१०९. और नियत करते हैं वास्ते अल्लाह के बेटियां, पवित्रता है उसको, और वास्ते उनके हैं जो कुछ चाहें॥ क़सम अल्लाह की अवश्य भेजा हमने पैग़म्बर॥

—मं॰ ३। सि॰ १४। सू॰ १६। आ॰ ५७।६३॥

समीक्षक—अल्लाह बेटियों से क्या करेगा? बेटियां तो किसी मनुष्य को चाहिएं, क्यों बेटे नियत नहीं किये जाते और बेटियां नियत की जाती हैं? इसका क्या कारण? बताइये? क़सम खाना झूठों का काम है, ख़ुदा की बात नहीं। क्योंकि बहुधा संसार में ऐसा दीखने में आता है जो झूठा होता है वही क़सम खाता है, सच्चा सौगन्द क्यों खावे?॥१०९॥

११०. ये लोग वे हैं कि मोहर रक्खी अल्लाह ने ऊपर दिलों उनके और कानों उनके और आँखों उनकी के और ये लोग वे हैं बेख़बर॥ और पूरा दिया जावेगा हर जीव को जो कुछ किया है और वे अन्याय न किये जावेंगे॥

—मं॰ ३। सि॰ १४। सू॰ १६। आ॰ १०८।१११॥

समीक्षक—जब ख़ुदा ही ने मोहर लगा दी तो वे बिचारे विना अपराध मारे गये क्योंकि उनको पराधीन कर दिये, यह कितना बड़ा अपराध है? और फिर कहते हैं कि जिसने जितना किया है उतना ही उसको दिया जायेगा, न्यूनाधिक नहीं। भला! उन्होंने स्वतन्त्रता से पाप किये ही नहीं किन्तु ख़ुदा के कराने से किये, पुनः उनका अपराध ही न हुआ, उनको फल न मिलना चाहिये। इसका फल ख़ुदा को मिलना उचित है। और जो पूरा दिया जाता है, तो क्षमा किस बात की की जाती है? और जो क्षमा की जाती है, तो न्याय उड़ जाता है। ऐसी गड़बड़ाध्याय की [बात] ईश्वर की कभी नहीं हो सकती, कि[न्तु] निर्बुद्धि छोकरों की होती है॥११०॥

१११. और किया हमने दोज़ख़ को वास्ते काफ़िरों के घेरने वाला स्थान॥ और हर आदमी को लगा दिया हमने उसको अमलनामा उसकी बीच गर्दन उसकी के, और निकालेंगे हम वास्ते उसके दिन क़यामत के एक किताब कि देखेगा उसको खुला हुआ॥ और बहुत मारे हमने क़ुरनून से पीछे नूह के॥

—मं॰ ४। सि॰ १५। सू॰ १७। आ॰ ८।१३।१७॥

समीक्षक—यदि काफ़िर वे ही हैं कि जो क़ुरान, पैग़म्बर और क़ुरान के कहे ख़ुदा, सातवें आसमान और निवाज़ आदि को न मानने वाले, उन्हीं के लिये दोज़ख़ होवे, तो यह बात केवल पक्षपात की ठहरे। क्योंकि क्या क़ुरान ही के मानने वाले सब अच्छे और अन्य के मानने वाले बुरे हो सकते हैं? यह बड़ी लड़कपन की बात है कि उसके गर्दन पर कर्म की लेख खुदा ने लिख दी। यह बात सर्वथा विरुद्ध है, क्योंकि गर्दन की नाडी-नाडी और हाड़-हाड़ देखने से भी कुछ भी कहीं लिखा नहीं पाता, और क़यामत की रात को किताब निकालेगा ख़ुदा तो आजकल वह किताब कहां है? क्या साहूकार की बही [के] समान लिखता रहता है? हां! यहां यह विचारना चाहिये कि जो पूर्व जन्म नहीं, तो जीवों के कर्म ही नहीं हो सकते, तो फिर कर्म की रेखा क्या लिखी? और जो विना कर्म के लिखा तो उन पर अन्याय किया, क्योंकि विना अच्छे बुरे कर्मों के उनको दुःख सुख क्यों दिया? जो कहो कि ख़ुदा की मरजी, तो भी उसने अन्याय किया। अन्याय उसीको कहते हैं कि विना बुरे भले कर्म किये दुःख सुखरूप फल न्यूनाधिक देना। और उस समय ख़ुदा ही किताब बांचेगा वा कोई सरिश्तेदार सुनावेगा? जो ख़ुदा ही ने दीर्घकाल सम्बन्धी जीवों को विना अपराध मारा तो वह अन्यायकारी हो गया। जो अन्यायकारी होता है वह ख़ुदा ही नहीं हो सकता॥१११॥

११२. और दिया हमने समूद को ऊंटनी प्रमाण॥ और बहका जिसको बहका सके॥ जिस दिन बुलावेंगे हम उन लोगों के साथ पेशवाओं उनके के बस जो कोई दिया गया अमलनामा उसका बीच दहिने हाथ उसके के॥

—मं॰ ४। सि॰ १५। सू॰ १७। आ॰ ५९।६४।७१॥

समीक्षक—वाह! जितनी ख़ुदा की निशानी आश्चर्य हैं, उन में से एक ऊंटनी भी ख़ुदा के होने में प्रमाण अथवा परीक्षा में साधक है। यदि ख़ुदा ने शैतान को बहकाने का हुक्म दिया, तो ख़ुदा ही शैतान का सरदार और सब पाप कराने वाला ठहरा, ऐसे को ख़ुदा कहना केवल कम समझ की बात है। जब क़यामत की अर्थात् प्रलय ही में न्याय करने कराने के लिए पैग़म्बर और उनके उपदेश मानने वालों को ख़ुदा बुलावेगा, तो जब तक प्रलय न होगा, तब तक सब दौड़ा सुपुर्द रहे और दौड़ा सुपुर्द सब को दुःखदायक है, जब तक न्याय न किया जाय। इसलिये शीघ्र न्याय करना न्यायाधीश का उत्तम काम है। यह तो पोपाँबाई का न्याय ठहरा। जैसे कोई न्यायाधीश कहे कि जब तक पचास वर्ष तक के चोर और साहूकार इकट्ठे न हों, तब तक उन को दण्ड वा प्रतिष्ठा न करनी चाहिए, वैसा ही यह हुआ कि एक तो पचास वर्ष तक दौड़ा सुपुर्द रहा और एक आज ही पकड़ा गया, ऐसा न्याय का काम नहीं हो सकता। न्याय तो वेद और मनुस्मृति का देखो जिसमें क्षण मात्र भी विलम्ब नहीं होता और अपने-अपने कर्मानुसार दण्ड वा प्रतिष्ठा सदा पाते रहते हैं। दूसरा पैग़म्बरों को गवाही के तुल्य रखने से ईश्वर की सर्वज्ञता की हानि है। भला! ऐसा पुस्तक ईश्वरकृत और ऐसे पुस्तक का उपदेश करनेवाला ईश्वर कभी हो सकता है? कभी नहीं॥११२॥

११३. ये लोग वास्ते उनके हैं बाग़ हमेशः रहने के, चलती हैं नीचे उनके से नहरें, गहना पहिनाये जावेंगे बीच उसके कंगन सोने के से और पोशाक पहिनेंगे वस्त्र हरित लाही की से और ताफ़ते की से तकिये किये हुए बीच उसके ऊपर तख़तों के, अच्छा है पुण्य और अच्छी है बहिश्त लाभ उठाने की॥

—मं॰ ४। सि॰ १५। सू॰ १८। आ॰ ३१॥

समीक्षक—वाह जी वाह! क्या क़ुरान का स्वर्ग है जिसमें बाग़, गहने, कपड़े, गद्दा, तकिये आनन्द के लिये हैं। भला! कोई बुद्धिमान् यहां विचार करे, तो यहां से वहां मुसलमानों के बहिश्त में अधिक कुछ भी नहीं है सिवाय अन्याय के। वह यह कि कर्म उनके अन्त वाले और फल उनका अनन्त और जो मीठा नित्य खावे, तो थोड़े दिन में विष के समान प्रतीत होता है। जब सदा वे सुख भोगेंगे, तो उनको सुख ही दुःख रूप हो जायगा, इसलिये महाकल्प पर्यन्त मुक्तिसुख भोग के पुनर्जन्म पाना ही सत्य सिद्धान्त है॥११३॥

११४. और यह बस्तियां हैं कि मारा हमने उनको जब अन्याय किया उन्होंने, और हमने उनके मारने की प्रतिज्ञा स्थापन की॥

—मं॰ ४। सि॰ १५। सू॰ १८। आ॰ ५९॥

समीक्षक—भला! सब बस्ती भर पापी कभी हो सकती है? और पीछे से प्रतिज्ञा करने से ईश्वर सर्वज्ञ नहीं रहा, क्योंकि जब उनका अन्याय देखा तब प्रतिज्ञा की, पहिले नहीं जानता था, इससे दयाहीन भी ठहरा॥११४॥

११५. और वह जो लड़का, बस थे मा बाप उसके ईमान वाले, बस डरे हम यह कि पकड़ें उनको सरकशी में और कुफ्र में॥ यहां तक कि पहुंचा जगह डूबने सूर्य्य की, पाया उसको डूबता था बीच चश्मे कीचड़ के॥ कहा ऐज़ुलक़रनैन निश्चय याजूज माजूज फ़िसाद करने वाले हैं बीच पृथिवी के॥

—मं॰ ४। सि॰ १६। सू॰ १८। आ॰ ८०।८६।९४॥

समीक्षक—भला! यह ख़ुदा की कितनी बेसमझ है। शङ्का से डरा कि यह लड़का अपने मा बाप को शायद मेरे मार्ग से बहका कर अलग न कर देवे। यह कभी ईश्वर की बात नहीं हो सकती। अब आगे की अविद्या की बात देखिये कि इस किताब का बनाने वाला सूर्य्य को एक झील में रात्रि को डूबा जानता है, फिर प्रातःकाल निकलता है। भला! सूर्य्य तो पृथिवी से बहुत बड़ा है, वह नदी वा झील वा समुद्र में कैसे डूब सकेगा! इससे यह विदित हुआ कि क़ुरान के बनाने वाले को भूगोल खगोल की विद्या नहीं थी। जो होती तो ऐसी विद्याविरुद्ध बात क्यों लिख देता? और इस पुस्तक के मानने वालों को भी विद्या नहीं है। जो होती तो ऐसी मिथ्या बातों से युक्त पुस्तक को क्यों मानते? अब देखिये ख़ुदा का अन्याय! आप ही पृथिवी का बनाने वाला राजा न्यायाधीश है और याजूज माजूज को पृथिवी में फ़साद भी करने देता है। यह ईश्वरता की बात से विरुद्ध है। इससे ऐसी पुस्तक को जङ्गली लोग माना करते हैं, विद्वान् नहीं॥११५॥

११६. और याद करो बीच किताब के मर्यम को, जब जा पड़ी लोगों अपने से मकान पूर्वी में॥ बस पड़ा उनसे इधर पर्दा, बस भेजा हमने रूह अपनी को अर्थात् फ़रिश्ता, बस सूरत पकड़ी वास्ते उसके आदमी पुष्ट की॥ कहने लगी निश्चय मैं शरण पकड़ती हूं रहमान की तुझ से, जो है तू परहेजगार॥ कहने लगा सिवाय इसके नहीं कि मैं भेजा हुआ हूँ मालिक तेरे के से, तो कि दे जाऊं मैं तुझ को लड़का पवित्र॥ कहा कैसे होगा वास्ते मेरे लड़का नहीं हाथ लगाया मुझको आदमी ने, नहीं मैं बुरा काम करने वाली॥ बस गर्भित हो गई साथ उसके और जा पड़ी साथ उसके मकान दूर अर्थात् जंगल में॥

—मं॰ ४। सि॰ १६। सू॰ १९। आ॰ १६।१७।१८। १९।२०।२२॥

समीक्षक—अब बुद्धिमान् विचार लें कि फ़रिश्ते सब खुदा की रूह हैं, तो खुदा से अलग पदार्थ नहीं हो सकते। और शैतान भी नापाक रूह खुदा ही की हुई, तो खुदा ही नापाक हुआ। यदि ऐसा है तो ऐसे नापाक खुदा के भक्त पाक कैसे हो सकेंगे? दूसरा यह अन्याय कि वह मर्यम कुमारी के लड़का होना, किसी का संग करना नहीं चाहती थी, परन्तु खुदा के हुक्म से फ़रिश्ते ने उसको बलात्कार गर्भवती किया, यह न्याय से विरुद्ध बात है। यहाँ अन्य भी असभ्यता की बातें बहुत लिखी हैं उनको लिखना उचित नहीं समझा॥११६॥

११७. क्या नहीं देखा तू ने यह कि भेजा हमने शैतानों को ऊपर काफ़िरों के बहकाते हैं उनको बहकाने कर॥       —मं॰ ४। सि॰ १६। सू॰ १९। आ॰ ८३॥

समीक्षक—जब खुदा ही शैतानों को बहकाने के लिये भेजता है तो बहकने वालों का कुछ दोष नहीं हो सकता और न उनको दण्ड हो सकता और न शैतानों को, क्योंकि यह खुदा के हुक्म से सब होता है, इसका फल खुदा को होना चाहिये। जो सच्चा न्यायकारी है, तो उसका फल दोज़ख़ आप ही भोगे और जो न्याय को छोड़ के अन्याय को करे, तो अन्यायकारी हुआ। अन्यायकारी ही पापी कहाता है॥११७॥

११८. और निश्चय क्षमा करने वाला हूं वास्ते उस मनुष्य के तोबाः की और ईमान लाया और कर्म किये अच्छे, फिर मार्ग पाया॥

—मं॰ ४। सि॰ १६। सू॰ २०। आ॰ ८२॥

समीक्षक—जो तोबाः से पाप क्षमा करने की बात क़ुरान में है, यह सब को पापी कराने वाली है। क्योंकि पापियों को इससे पाप करने का साहस बहुत बढ़ जाता है। इस से यह पुस्तक और इस का बनाने वाला पापियों को पाप कराने में होंसला बढ़ाने वाले हैं। इस से यह पुस्तक परमेश्वरकृत और इस में कहा हुआ परमेश्वर भी नहीं हो सकता॥११८॥

११९. और जिसको चाहा मारा हमने हद्द से निकलने वालों को॥ बस पवित्रता है अल्लाह मालिक अर्श के को॥ और किये हमने बीच पृथिवी के पहाड़ ऐसा न हो कि हिल जावे॥              —मं॰ ४। सि॰ १७। सू॰ २१। आ॰ ९।२१।३१॥

समीक्षक—देखिये गदर लूटमार! कि जिसको [चाहा] उसने मारा और जिसको चाहा उसको बचाया। भले-बुरे कर्म की अपेक्षा कुछ नहीं करता। जब सातवें आसमान पर तख्त का निवासी अल्लाह है, वह सब जगत् का स्रष्टा, धर्त्ता, ज्ञाता कभी नहीं हो सकता। यदि क़ुरान का बनाने वाला पृथिवी का घूमना आदि जानता, तो यह बात कभी नहीं कहता कि पहाड़ों के धरने से पृथिवी नहीं हिलती। शंका हुई कि जो पहाड़ न धरता, तो हिल जाती! इतने कहने पर भी भूकम्प में क्यों डिग जाती है?॥११९॥

१२०. और शिक्षा दी हमने उस औरत को और रक्षा की उसने अपने गुह्य अङ्गों की, बस फूंक दिया हमने बीच उसके रूह अपनी को॥

—मं॰ ४। सि॰ १७। सू॰ २१। आ॰ ९१॥

समीक्षक—ऐसी अश्लील बातें ख़ुदा की पुस्तक, ख़ुदा की और सभ्य मनुष्य की भी न[हीं] होती। जब कि मनुष्यों में ऐसी बातों का लिखना अच्छा नहीं, तो परमेश्वर के सामने क्योंकर अच्छा हो सकता है? ऐसी-ऐसी बातों से क़ुरान दूषित होता है। यदि अच्छी बातें होती, तो अति प्रशंसा होती, जैसी वेदों की॥१२०॥

१२१. क्या नहीं देखा तूने यह कि अल्लाह को सिज़दा करते हैं जो कोई बीच आसमानों और पृथिवी के, हैं सूर्य्य और चन्द्र तारे और पहाड़, वृक्ष और जानवर॥ पहिनाये जावेंगे बीच उसके कंगन सोने और मोती के और पहिनावा उनका बीच उसके रेशमी हैं॥ और पवित्र रख घर मेरे को वास्ते गिर्द फिरने वालों के और खड़े रहने वालों के॥ फ़िर चाहिये कि दूर करें मैल अपने और पूरी करें भेटें अपनी और चारों ओर फिरें घर क़दीम के॥ तो कि नाम अल्लाह का याद करें॥              —मं॰ ४। सि॰ १७। सू॰ २२। आ॰ १८।२३।२६।२९।३४॥

समीक्षक—भला! जो जड़ वस्तु हैं, वे परमेश्वर को जान ही नहीं सकते, फिर वे उस की भक्ति क्योंकर कर सकते हैं? इस से यह पुस्तक ईश्वरकृत तो कभी नहीं हो सकता, किन्तु किसी भ्रान्त ने बनाया हुआ दीखता है। वाह! बड़ा अच्छा स्वर्ग है, जहां सोने, मोती के गहने और रेशमी कपड़ा पहिरने को मिलें। यह बहिश्त यहाँ के राजाओं के घर से अधिक नहीं दीख पड़ता। और जब परमेश्वर का घर है, तो वह उसी घर में रहता भी होगा, फिर बुतपरस्ती क्यों न हुई? और दूसरे बुतपरस्तों का खण्डन क्यों करते हैं? जब ख़ुदा भेंट लेता, अपने घर की परिक्रमा करने की आज्ञा देता है और पशुओं को मरवा के खिलाता है, तो यह ख़ुदा मन्दिरवाले और भैरव, दुर्गा के सदृश हुआ और महाबुतपरस्ती का चलाने वाला हुआ। क्योंकि मूर्त्तियों से मस्जिद बड़ा बुत है। इस से ख़ुदा और मुसलमान बड़े बुतपरस्त और पुराणी तथा जैनी छोटे बुतपरस्त हैं॥१२१॥

१२२. फिर निश्चय तुम दिन क़यामत के उठाये जाओगे॥

—मं॰ ४। सि॰ १८। सू॰ २३। आ॰ १६॥

समीक्षक—क़यामत तक मुर्दे क़बरों में रहेंगे वा किसी अन्य जगह? जो उन्हीं में रहेंगे तो सड़े हुए दुर्गन्धरूप शरीर में रहकर पुण्यात्मा भी दुःख भोग करेंगे? यह न्याय अन्याय है। और दुर्गन्ध अधिक होकर रोगोत्पत्ति करने से ख़ुदा और मुसलमान पापभागी होंगे॥१२२॥

१२३. उस दिन की गवाही देवेंगे ऊपर उनके ज़बानें उनकी और हाथ उनके और पांव उनके साथ उस वस्तु के कि थे करते॥ अल्लाह नूर है आसमानों का और पृथिवी का, नूर उसके कि मानिन्द ताक़ की है बीच उसके दीप हो, और दीप बीच कंदील शीशों के हैं, वह कंदील मानो कि तारा है चमकता, रोशन किया जाता है दीपक वृक्ष मुबारिक जैतून के से, न पूर्व की ओर है न पश्चिम की, समीप है तैल उस का रोशन हो जावे जो न लगे ऊपर रोशनी के, मार्ग दिखाता है अल्लाह नूर अपने के जिसको चाहता है॥

—मं॰ ४। सि॰ १८। सू॰ २४। आ॰ २४।३५॥

समीक्षक—हाथ पग आदि जड़ होने से गवाही कभी नहीं दे सकते यह बात सृष्टिक्रम से विरुद्ध होने से मिथ्या है। क्या ख़ुदा आगी बिजुली है? जैसा कि दृष्टान्त देते हैं ऐसा दृष्टान्त ईश्वर में नहीं घट सकता। हां, किसी साकार वस्तु में घट सकता है॥१२३॥

१२४. और अल्लाह ने उत्पन्न किया हर जानवर को पानी से बस कोई उनमें से वह है कि जो चलता है ऊपर पेट अपने के॥ और जो कोई सेवा करे अल्लाह की रसूल उसके की॥ कह सेवा करो खुदा की और सेवा करो रसूल की ताकि दया किये जाओ॥    —मं॰ ४। सि॰ १८। सू॰ २४। आ॰ ४५।५२।५४।५६॥

समीक्षक—यह कौन सी फ़िलासफ़ी है कि जिन जानवरों के शरीर में सब तत्त्व दीखते हैं और कहना कि केवल पानी से उत्पन्न किये? यह केवल अविद्या की बात है। जब अल्लाह के साथ पैग़म्बर की सेवा करनी होती है, तो खुदा का शरीक हो गया वा नहीं? यदि ऐसा [है,] तो खुदा को लाशरीक क्यों क़ुरान में लिखा और कहते हो?॥१२४॥

१२५. और जिस दिन कि फट जावेगा आसमान साथ बदली के, और उतारे जावेंगे फ़रिश्ते॥ बस मत कहा मान काफ़िरों का, और झगड़ा कर उनसे साथ झगड़ा बढा॥ और बदल डालता है अल्लाह बुराइयों उनकी को भलाइयों से॥ और जो कोई तोबाः करे और कर्म करे अच्छे बस निश्चय आता है तरफ़ अल्लाह की॥              —मं॰ ४। सि॰ १९। सू॰ २५। आ॰ २६।५२।७०।७१॥

समीक्षक—यह बात कभी सच नहीं हो सकती है कि आकाश बद्दलों के साथ फट जावे। यदि आकाश कोई मूर्त्तिमान् पदार्थ हो तो फट सकता है। यह मुसलमानों का क़ुरान और खुदा शान्तिभङ्ग कर गदर झगड़ा मचाने वाला है, इसीलिये धार्मिक विद्वान् लोग इस को नहीं मानते। यह भी अच्छा न्याय है कि जो पाप और पुण्य का अदला बदला हो जाय! क्या यह तिल और उड़द की सी बात है, जो पलटा हो जावे? जो तोबाः करने से पाप छूटे और ईश्वर मिले, तो कोई भी पाप करने से न डरे, इसलिये ये सब बातें विद्या से विरुद्ध हैं॥१२५॥

१२६. वही की हमने तरफ़ मूसा की यह कि ले चला रात को बन्दओं मेरे को, निश्चय तुम पीछा किये जाओगे॥ बस भेजे लोग फ़िरोन ने बीच नगरों के जमा करने वाले॥ और वह पुरुष कि जिस ने पैदा किया मुझ को, बस वही मार्ग दिखलाता है॥ और वह जो खिलाता है मुझको पिलाता है मुझको॥ और वह पुरुष कि आशा रखता हूं मैं यह कि क्षमा करे वास्ते मेरे, अपराध मेरा दिन क़यामत के॥            —मं॰ ५। सि॰ १९। सू॰ २६। आ॰ ५२।५३।७८।७९।८२॥

समीक्षक—जब ख़ुदा ने मूसा की ओर वही भेजी पुनः दाऊद, ईसा और मुहम्मद साहेब की ओर किताब क्यों भेजी? क्योंकि परमेश्वर की बात सदा एक सी और बेभूल होती है। और उसके पीछे क़ुरान तक पुस्तकों का भेजना पहिली पुस्तक को अपूर्ण, भूलयुक्त माना जायगा। यदि ये तीन पुस्तक सच्चे हैं, तो यह क़ुरान झूठी होगी। चारों का जो कि परस्पर प्रायः विरोध रखते हैं, उन का सर्वथा सत्य होना नहीं हो सकता। यदि ख़ुदा ने रूह अर्थात् जीव पैदा किये हैं, तो वे मर भी जायेंगे अर्थात् उनका कभी न कभी अभाव भी होगा। जो परमेश्वर ही मनुष्यादि प्राणियों को खिलाता पिलाता है, तो किसी को रोग न होना चाहिये और सबको तुल्य भोजन देना चाहिये। पक्षपात से एक को उत्तम और दूसरे को [निकृष्ट] जैसा कि राजा और कंगले को, श्रेष्ठ निकृष्ट भोजन मिलता है न होना चाहिये। जब परमेश्वर ही खिलाने पिलाने और पथ्य कराने वाला है, तो रोग ही न होने चाहियें। परन्तु मुसलमान आदि को भी रोग होते हैं। यदि ख़ुदा ही रोग छुड़ा कर आराम करने वाला है, तो मुसलमानों के शरीरों में रोग न रहना चाहिये। यदि रहता है तो ख़ुदा पूरा वैद्य नहीं है। यदि पूरा वैद्य है, तो मुसलमानों के शरीर में रोग क्यों रहते हैं? यदि वही मारता और जिलाता है, तो उसी ख़ुदा को पाप पुण्य लगता होगा। यदि जन्म जन्मान्तर के कर्मानुसार व्यवस्था करता है, तो उसको कुछ भी अपराध नहीं। यदि वह पाप क्षमा और न्याय क़यामत की रात में करता है, तो ख़ुदा पाप बढ़ाने वाला होकर पापयुक्त होगा। यदि क्षमा नहीं करता, तो यह क़ुरान की बात झूठी है॥१२६॥

१२७. नहीं तू परन्तु आदमी मानिन्द हमारी, बस ले आ कुछ निशानी जो है तू सच्चों से॥ कहा यह ऊंटनी है वास्ते उस के पानी पाना है एक वार॥

—मं॰ ५। सि॰ १९। सू॰ २६। आ॰ १५४।१५५॥

समीक्षक—यह ख़ुदा को शंका और अभिमान क्यों हुआ कि तू हमारे तुल्य नहीं है और ऊंटनी की निशानी देनी केवल जंगली व्यवहार है, ईश्वरकृत नहीं! यदि यह किताब ईश्वरकृत होती तो ऐसी व्यर्थ बातें इस में न होतीं॥१२७॥

१२८. ऐ मूसा बात यह है कि निश्चय मैं अल्लाह हूं ग़ालिब॥ और डाल दे असा अपना, बस जब कि देखा उसको हिलता था मानो कि वह सांप है,….ऐ मूसा मत डर, निश्चय नहीं डरते समीप मेरे पैग़म्बर॥ अल्लाह नहीं कोई माबूद परन्तु वह मालिक अर्श बड़े का॥ यह कि मत सरकशी करो ऊपर मेरे और चले आओ मेरे पास मुसलमान होकर॥ —मं॰ ५। सि॰ १९। सू॰ २७। आ॰ ९।१०।२६।३१॥

समीक्षक—और भी देखिये! अपने मुख से आप अल्लाह और बड़ा ज़बरदस्त बनता है। अपने मुख से अपनी प्रशंसा करना श्रेष्ठ पुरुष का भी काम नहीं, ख़ुदा का क्योंकर हो सकता है? तभी तो इन्द्रजाल का लटका दिखला, जंगली मनुष्यों को वश कर, आप जंगलस्थ ख़ुदा बन बैठा। ऐसी बात ईश्वर के पुस्तक की कभी नहीं हो सकती। यदि वह बड़े अर्श अर्थात् सातवें आसमान का मालिक है तो वह एकदेशी होने से ईश्वर ही नहीं हो सकता है। यदि सरकशी करना बुरा है, तो ख़ुदा ने, मुहम्मद साहेब और फरिश्तों को ईमान लाने, सेवा करने में साथ क्यों मिलाया, इससे सरकशी हुई वा नहीं? इससे यह क़ुरान पुनरुक्त और पूर्वापर विरुद्ध बातों से भरा हुआ है॥१२८॥

१२९. और देखेगा तू पहाड़ों को अनुमान करता है तू उनको जमे हुए और वे चले जाते हैं मानिन्द चलने बादलों की, कारीगरी अल्लाह की जिसने दृढ़ किया हर वस्तु को, निश्चय वह ख़बरदार है उस वस्तु के कि करते हो॥

—मं॰ ५। सि॰ २०। सू॰ २७। आ॰ ८८॥

समीक्षक—भला! बद्दलों के समान पहाड़ का चलना क़ुरान बनाने वालों के देश में होता होगा, अन्यत्र नहीं। और ख़ुदा की ख़बरदारी तो शैतान बागी को न पकड़ने और न दंड देने से ही विदित होती है कि जिसने एक बाग़ी को भी अब तक न पकड़ पाया, न दंड दिया। इस से अधिक असावधानीता क्या होगी॥१२९॥

१३०. बस मुष्ट मारा उस को मूसा ने, बस पूरी की आयु उसकी॥ कहा ऐ रब मेरे! निश्चय मैंने अन्याय किया जान अपनी को, बस क्षमा कर मुझ को, बस क्षमा कर दिया उसको, निश्चय वह क्षमा करने वाला दयालु है॥ और मालिक तेरा उत्पन्न करता है, जो कुछ चाहता है और पसन्द करता है॥

—मं॰ ५। सि॰ २०। सू॰ २८। आ॰ १५।१६।६८॥

समीक्षक—अब अन्य भी देखिये! मुसलमान और ईसाइयों के पैग़म्बर और ख़ुदा कि मूसा पैग़म्बर मनुष्य की हत्या किया करे और ख़ुदा क्षमा किया करे, ये दोनों अन्यायकारी हैं वा नहीं? क्या अपनी इच्छा ही से जैसा चाहता है वैसी उत्पत्ति करता है? क्या उसने अपनी इच्छा ही से एक को राजा, दूसरे को कङ्गाल और एक को विद्वान् और दूसरे को मूर्खादि किया है? यदि ऐसा है तो यह अन्यायकारी होने से क़ुरान सत्य और यह ख़ुदा ही नहीं हो सकता॥१३०॥

१३१. और आज्ञा दी हम ने साथ मा बाप के भलाई करना और जो झगड़ा करें तुझ से दोनों यह कि शरीक लावे तू साथ मेरे उस वस्तु को, कि नहीं वास्ते तेरे साथ उस के ज्ञान, बस मत कहा मान उन दोनों का, तर्फ़ मेरी है॥ और अवश्य भेजा हमने नूह को तर्फ क़ौम उसके कि बस रहा बीच उनके हजार वर्ष परन्तु पचास वर्ष कम उस दिन ढांक लेगा उसको अजाब ऊपर उनके से॥

—मं॰ ५। सि॰ २०-२१। सू॰ २९। आ॰ ८।१४॥

समीक्षक—माता पिता की सेवा करनी तो अच्छी ही है। जो ख़ुदा के साथ शरीक करने के लिये कहे, तो उनका कहा न मानना, यह भी ठीक है, परन्तु यदि माता-पिता मिथ्याभाषणादि करने की आज्ञा देवें, तो क्या मान लेना चाहिये, इसलिये यह बात आधी अच्छी और आधी बुरी है। क्या नूह आदि पैग़म्बर ही को ख़ुदा संसार में भेजता है, तो अन्य जीवों को कौन भेजता है? यदि सब को वही भेजता है, तो सभी पैग़म्बर क्यों नहीं? और जो प्रथम मनुष्यों की हज़ार वर्ष की आयु होती थी, तो अब क्यों नहीं होती? इसलिये यह बात ठीक नहीं। यदि खुदा के न्यायघर में भी नीचे शिर, ऊपर पग बांधकर दंड दिया जाता है, तो उससे आजकल ही का राज अच्छा है। आजकल दण्ड तो दिया जाता है, परन्तु पग नीचे और शिर ऊपर ही रक्खा जाता है। यदि ऐसा ही दण्ड हो, तो भी मनुष्यों में संघटित हो सकता है॥१३१॥

१३२. अल्लाह पहिली वार करता है उत्पत्ति फिर दूसरी वार करेगा उस को, फिर उसी की ओर फेरे जाओगे॥ जिस दिन बरपा अर्थात् खड़ी होगी क़यामत निराश होंगे पापी॥ बस जो लोग कि ईमान लाये और काम किये अच्छे बस वे बीच बाग़ के सिंगार करवाये जावेंगे॥ और जो भेज दें हम एक बाव बस देखें उस खेती को पीली हुई॥ इसी प्रकार मोहर रखता है अल्लाह ऊपर दिलों उन लोगों के कि नहीं जानते॥    —मं॰ ५। सि॰ २१। सू॰ ३०। आ॰ ११।१२।१५।५१।५९॥

समीक्षक—यदि अल्लाह दो वार उत्पत्ति करता है, तीसरी वार नहीं, तो उत्पत्ति की आदि और दूसरी वार के अन्त में निकम्मा बैठा रहता होगा? और एक तथा दो वार उत्पत्ति के पश्चात् उसका सामर्थ्य निकम्मा और व्यर्थ हो जायगा। यदि न्याय करने के लिये दिन न रख कर, रात रक्खी जाय तो गवर्गण्ड-सी लीला हो जाय। न्याय तो दिन ही में करना सर्वत्र प्रसिद्ध है। इसीलिये यह मुसलमान और मुसलमानों के ख़ुदा की उल्टी बात है। यदि बगीचे में रखना और शृंगार पहिराना ही मुसलमानों का स्वर्ग है, तो इस संसार के तुल्य हुआ और वहां माली और सुनार भी होंगे अथवा ख़ुदा ही माली और सुनार आदि का काम करता होगा। यदि किसी को कम गहना मिलता होगा, तो चोरी भी होती होगी और बहिश्त से चोरी करने वालों को दोज़ख में भी डालता होगा। यदि ऐसा होता होगा, तो ‘सदा बहिश्त में रहेंगे’ यह बात झूठी हो जायगी। जो किसानों की खेती पर भी ख़ुदा की दृष्टि है, यह विद्या खेती करने के अनुभव ही से होती है और यदि माना जाय कि ख़ुदा ने अपनी विद्या से सब बात जान ली है तो ऐसा भय देना अपना घमण्ड प्रसिद्ध करना है। यदि अल्लाह ने जीवों के दिलों पर मोहर लगा पाप कराया, तो उस पाप का भागी वही होवे, जीव नहीं हो सकते। जैसे जय पराजय सेनाधीश का होता है, वैसे यह सब पाप ख़ुदा ही को प्राप्त होवे॥१३२॥

१३३. ये आयतें हैं किताब हिक्मत वाले की॥ उत्पन्न किया आसमानों को विना सुतून अर्थात् खम्भे के देखते हो तुम उस को और डाले बीच पृथिवी के पहाड़ ऐसा न हो कि हिल जावे॥ क्या नहीं देखा तूने यह कि अल्लाह प्रवेश कराता है रात को बीच दिन के और प्रवेश कराता है दिन को बीच रात के॥ क्या नहीं देखा कि किश्तियां चलती हैं बीच दरिया के साथ निआमतों अल्लाह के, तौ कि दिखलावे तुम को निशानियां अपनी॥

—मं॰ ५। सि॰ २१। सू॰ ३१। आ॰ २।१०।२९।३१॥

समीक्षक—वाह जी! हिक्मतवाली किताब! कि जिस में सर्वथा विद्या से विरुद्ध आकाश की उत्पत्ति और उस में खम्भे लगाने की शंका और पृथिवी को स्थिर रखने के लिये पहाड़ रखना! थोड़ी सी विद्या वाला भी ऐसा लेख कभी नहीं करता और न मानता। और हिक्मत देखो कि जहाँ दिन है वहां रात नहीं और जहां रात है वहां दिन नहीं, उसको एक दूसरे में प्रवेश कराना लिखता है, यह बड़े अविद्वानों की बात है, इसलिये यह कुरान विद्या की पुस्तक नहीं हो सकती। क्या यह विद्याविरुद्ध बात नहीं है कि नौका, मनुष्य और क्रियाकौशलादि से चलती हैं वा ख़ुदा की कृपा से? यदि लोहे वा पत्थरों की नौका बना कर समुद्र में चलावें तो ख़ुदा की निशानी डूब जाय वा नहीं? इसलिये यह पुस्तक न विद्वान् और न ईश्वर की बनाई हुई हो सकती है॥१३३॥

१३४. तदबीर करता है काम की आसमान से तरफ़ पृथिवी की फिर चढ़ जाता है तरफ़ उस की बीच एक दिन के कि है अवधि उस की सहस्र वर्ष उन वर्षों से कि गिनते हो तुम॥ यह है जानने वाला गैब का और प्रत्यक्ष का दयालु॥ फिर पुष्ट किया उस को और फूंका बीच उस के रूह अपनी से॥ कह क़ब्ज़ करेगा तुम को फ़रिश्ता मौत का वह जो नियत किया गया है साथ तुम्हारे॥ और जो चाहते हम अवश्य देते हम हर एक जीव को शिक्षा उस की, परन्तु सिद्ध हुई बात मेरी ओर से कि अवश्य भरूंगा मैं दोज़ख़ को जिनों से और आदमियों से इकट्ठे॥

—मं॰ ५। सि॰ २१। सू॰ ३२। आ॰ ५।६।९।११।१३॥

समीक्षक—अब ठीक सिद्ध हो गया कि मुसलमानों का ख़ुदा मनुष्यवत् एकदेशी है। क्योंकि जो व्यापक होता तो एकदेश से प्रबन्ध करना और उतरना चढ़ना नहीं हो सकता। यदि ख़ुदा फ़रिश्ते को भेजता है तो भी आप एकदेशी हो गया। आप आसमान पर टंगा बैठा है और फ़रिश्तों को दौड़ाता है। यदि फ़रिश्ते रिश्वत लेकर कोई मामला बिगाड़ दें वा किसी मुर्दे को छोड़ जायें, तो ख़ुदा को क्या मालूम हो सकता है? मालूम तो उसको हो कि जो सर्वज्ञ तथा सर्वव्यापक हो, सो तो है ही नहीं; होता तो फ़रिश्तों के भेजने तथा कई लोगों की कई प्रकार से परीक्षा लेने का क्या काम था? और एक हजार वर्षों में प्रबन्ध करने से सर्वशक्तिमान् भी नहीं। यदि मौत का फ़रिश्ता है, तो उस फ़रिश्ते का मारने वाला कौन सा मृत्यु है? यदि वह नित्य है, तो अमरपन में ख़ुदा के बराबर शरीक हुआ। एक फ़रिश्ता एक समय में यदि दोज़ख़ भरने के लिये जीवों को शिक्षा नहीं करता और उन को विना पाप किये अपनी मर्ज़ी से दोज़ख़ भर के उन को दुःख देकर तमाशा देखता है, तो वह ख़ुदा महापापी अन्यायकारी और दयाहीन है। ऐसी बातें जिस पुस्तक में हों, [न] वह विद्वान् और ईश्वरकृत, और दया न्यायहीन ईश्वर भी कभी नहीं हो सकता॥१३४॥

१३५. कह कि कभी न लाभ देगा भागना तुम को जो भागो तुम मृत्यु वा क़त्ल से॥ ऐ बीबियो नबी की! जो कोई आवे तुम में से निर्लज्जता प्रत्यक्ष के, दुगुणा किया जावेगा वास्ते उस के अज़ाब, और है यह ऊपर अल्लाह के सहल॥

—मं॰ ५। सि॰ २१। सू॰ ३३। आ॰ १६।३०॥

समीक्षक—यह मुहम्मद साहेब ने इसलिये लिखा लिखवाया होगा कि लड़ाई में कोई न भागे, हमारा विजय होवे, मरने से भी न डरे, ऐश्वर्य बढ़े मज़हब बढ़ा लेवें? और यदि बीबी निर्लज्जता से पैग़म्बर के सामने न आवे, तो क्या पैग़म्बर साहेब निर्लज्ज हो कर उनके सामने जावें? और पैग़म्बर साहेब पर अज़ाब न होवे, यह किस घर का न्याय है?॥१३५॥

१३६. और अटकी रहो बीच घरों अपने के,….और आज्ञा पालन करो अल्लाह और रसूल की, सिवाय इस के नहीं॥ बस जब अदा कर ली जैद ने हाज़त उस से ब्याह दिया हम ने तुझ से उस को तौकि न होवे ऊपर ईमान वालों के तंगी बीच बीबियों लेपालकों उनके के, जब अदा कर लें उन से हाज़त और है आज्ञा ख़ुदा की की गई॥ नहीं है ऊपर नबी के कुछ तंगी बीच उस वस्तु के॥ नहीं है मुहम्मद बाप किसी मर्दों का॥ और हलाल की स्त्री ईमानवाली जो देवे विना महर के जान अपनी वास्ते नबी के॥ ढील देवे तू जिस को चाहे उन में से और जगह देवे तर्फ़ अपनी जिस को चाहे, नहीं पाप ऊपर तेरे॥ ऐ लोगो! जो ईमान लाये हो मत प्रवेश करो घरों में पैग़म्बर के॥

—मं॰ ५। सि॰ २२। सू॰ ३३। आ॰ ३३। ३७।३८।४०।५०।५१।५३॥

समीक्षक—यह बड़े अन्याय की बात है कि स्त्री घर में क़ैद के समान रहे और पुरुष खुल्ले रहें। क्या स्त्रियों का चित्त शुद्ध वायु, शुद्ध देश में भ्रमण करना, सृष्टि के अनेक पदार्थ देखना नहीं चाहता होगा? इसी अपराध से मुसलमानों के लड़के विशेष कर सैलानी और विषयी होते हैं। अल्लाह और रसूल की एक अविरुद्ध आज्ञा है वा भिन्न-भिन्न विरुद्ध? यदि एक है तो दोनों की आज्ञा पालन करो कहना व्यर्थ है और जो भिन्न-भिन्न विरुद्ध है तो एक सच्ची और दूसरी झूठी? एक ख़ुदा, दूसरा शैतान हो जायगा। और शरीक भी होगा? वाह क़ुरान का ख़ुदा और पैग़म्बर तथा क़ुरान को! जिस को दूसरे का मतलब नष्ट कर अपना मतलब सिद्ध करना इष्ट हो वह ऐसी लीला अवश्य रचता है। इस से यह भी सिद्ध हुआ कि मुहम्मद साहेब बड़े विषयी थे। यदि न होते तो ‘लेपालक’ बेटे की स्त्री को जो पुत्र की स्त्री थी अपनी स्त्री क्यों कर लेते? और फिर ऐसी बातें करने वाले का ख़ुदा भी पक्षपाती बना और अन्याय को न्याय ठहराया। भला, कोई भी मनुष्यों में से जो जङ्गली भी होगा, वह भी बेटे की स्त्री को छोड़ता है। और यह कितनी बड़ी अन्याय की बात है कि नबी को विषयासक्ति की लीला करने में कुछ भी अटकाव नहीं होना! यदि नबी किसी का बाप न था तो ज़ैदको (लेपालक) बेटा किस का था? और क्यों लिखा? यह उसी मतलब की बात है कि जिस से बेटे की स्त्री को भी घर में डालने से पैग़म्बर साहेब न बचे, अन्य से क्योंकर बचे होंगे? ऐसी चतुराई से भी बुरी बात में निन्दा होनी कभी नहीं छूट सकती। क्या जो कोई पराई स्त्री भी नबी से प्रसन्न हो कर विवाह करना चाहे, तो भी हलाल है? और यह महा अधर्म की बात है कि नबी तो जिस स्त्री को चाहे छोड़ देवे और मुहम्मद साहेब की स्त्रीलोग यदि पैग़म्बर अपराधी भी हो, तो भी कभी न छोड़ सकें! जैसे पैग़म्बर के घरों में अन्य कोई व्यभिचार दृष्टि से प्रवेश न करें, तो वैसे पैग़म्बर साहेब भी किसी के घर में प्रवेश न करें। क्या नबी जिस किसी के घर में चाहें निश्शङ्क प्रवेश करें और माननीय भी रहें? भला! कौन ऐसा हृदय का अन्धा है कि जो इस क़ुरान को ईश्वरकृत और मुहम्मद साहेब को पैग़म्बर और कुरानोक्त ईश्वर को परमेश्वर मान सके। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसे युक्तिशून्य धर्मविरुद्ध बातों को अर्बदेशनिवासी आदि मनुष्यों ने इस मत को क्योंकर मान लिया!॥१३६॥

१३७. नहीं योग्य वास्ते तुम्हारे यह कि दुःख दो रसूल को, यह कि निकाह करो बीबियों उस की को पीछे उस के कभी, निश्चय यह है समीप अल्लाह के बड़ा पाप॥ निश्चय जो लोग कि दु;ख देते हैं अल्लाह को और रसूल उस के को, लानत की है उन को अल्लाह ने॥ और वे लोग कि दुःख देते हैं मुसलमानों को और मुसलमान औरतों को विना इसके बुरा किया है उन्होंने, बस निश्चय उठाया उन्होंने बोहतान अर्थात् झूठ और प्रत्यक्ष पाप॥ लानत, मारे जावें जहां पाये जावें, पकड़े जावें और मारे जावें खूब मारा जाना॥ ऐ रब हमारे, दे उन को द्विगुणा अज़ाब से, और लानत से बड़ी लानत कर॥

—मं॰ ५। सि॰ २२। सू॰ ३३। आ॰ ५३।५७।५८।६१।६८॥

समीक्षक—वाह! क्या ख़ुदा अपनी खुदाई को धर्म के साथ दिखला रहा है? जैसे रसूल को दुःख देने का निषेध करना तो ठीक है परन्तु दूसरे को दुःख देने में रसूल को भी रोकना योग्य था, क्यों न रोका? क्या किसी के दुःख देने से अल्लाह भी दुःखी हो जाता है? यदि ऐसा है तो वह ईश्वर ही नहीं हो सकता। क्या अल्लाह और रसूल को दुःख देने का निषेध करने से यह नहीं सिद्ध होता कि अल्लाह और रसूल जिस को चाहें दुःख देवें? जैसा मुसलमानों और मुसलमानों की स्त्रियों को दुःख देना बुरा है तो इन से अन्य मनुष्यों को दुःख देना भी अवश्य बुरा है।। क्या अन्य सबको दुःख देना चाहिये? जो ऐसा माने, तो उस की यह बात भी पक्षपात की है। वाह ग़दर मचाने वाले ख़ुदा और नबी! जैसे ये निर्दयी हैं वैसे निर्दयी संसार में बहुत थोड़े होंगे। जैसा यह कि ‘अन्य लोग जहां पाये जावें, मारे जावें, पकड़े जावें’, लिखा है वैसा ही मुसलमानों पर कोई ऐसी ही आज्ञा देवे तो मुसलमानों को यह बात बुरी लगेगी वा नहीं? वाह क्या हिंस्र पैग़म्बर आदि हैं कि जो परमेश्वर से प्रार्थना करके अपने से दूसरों को दुगुणा दुःख देने के लिये प्रार्थना करना लिखा है। यह भी पक्षपात मतलबसिन्धुपन और महा अधर्म की बात है। इसी से अब तक भी मुसलमान लोगों में से बहुत से शठ लोग ऐसा ही कर्म करने में नहीं डरते। यह ठीक है कि सुशिक्षा के विना मनुष्य पशु के समान रहता है॥१३७॥

१३८. और अल्लाह वह पुरुष है कि भेजता है हवाओं को बस उठाती हैं बादलों को, बस हांक लेते हैं तरफ़ शहर मुर्दे की, बस जीवित किया हम ने साथ उसके पृथिवी को पीछे मृत्यु उस की के, इसी प्रकार क़बरों में से निकलना है॥ जिसने उतारा बीच घर सदा रहने के दया अपनी से, नहीं लगती हम को बीच उसके मेहनत और नहीं लगती बीच उस के मांदगी॥

—मं॰ ५। सि॰ २२। सू॰ ३५। आ॰ ९।३५॥

समीक्षक—वाह क्या फ़िलासफ़ी ख़ुदा की है। भेजता है वायु को, वह उठाता फिरता है बद्दलों को! और ख़ुदा उससे मुर्दों को जिलाता फिरता है! यह बात ईश्वर सम्बन्धी कभी नहीं हो सकती, क्योंकि ईश्वर का काम निरन्तर एक सा होता रहता है। जो घर होंगे वे विना बनावट के नहीं हो सकते और जो बनावट का है वह सदा नहीं रह सकता। जिस के शरीर है वह परिश्रम के विना दुःखी होता और शरीर वाला रोगी हुए विना कभी नहीं बचता। जो एक स्त्री से समागम करता है, वह विना रोग के नहीं बचता, तो जो बहुत स्त्रियों से विषयभोग करता है, उस की क्या ही दुर्दशा होती होगी? इसलिये मुसलमानों का बहिश्त भी सुखदायक सदा नहीं हो सकता॥१३८॥

१३९. क़सम है क़ुरान दृढ़ की॥ निश्चय तू भेजे हुओं से है॥ ऊपर मार्ग सीधे के॥ उतारा है ग़ालिब दयालु ने॥ —मं॰ ५। सि॰ २३। सू॰ ३६। आ॰ २।३।४।५॥

समीक्षक—अब देखिये! यह क़ुरान ख़ुदा की बनाई होती तो वह इस की सौगंद क्यों खाता? यदि नबी ख़ुदा का भेजा होता, तो लेपालक बेटे की स्त्री पर मोहित क्यों होता? यह कथनमात्र है कि क़ुरान के मानने वाले सीधे मार्ग पर हैं। क्योंकि सीधा मार्ग वही होता है जिस में सत्य मानना, सत्य बोलना, सत्य करना; पक्षपात रहित न्याय धर्म्म का आचरण करना आदि हैं और इनसे विपरीत का त्याग करना। सो न क़ुरान में, न मुसलमानों में और न इनके ख़ुदा में ऐसा स्वभाव है। यदि सब पर प्रबल पैग़म्बर मुहम्मद साहेब होते, तो सबसे अधिक विद्यावान् और शुभगुणयुक्त क्यों न होते? इसलिये जैसी कूंजड़ी अपने बेरों को खट्टा नहीं बतलाती, वैसी यह बात भी है॥१३९॥

१४०. और फूंका जावेगा बीच सूर के बस नागहां वह कबरों में से तरफ़ मालिक अपने की दौड़ेंगे॥ और गवाही देंगे पांव उनके साथ उस वस्तु के कमाते थे॥ सिवाय इसके नहीं कि आज्ञा उसकी जब चाहे उत्पन्न करना किसी वस्तु का यह कि कहता वास्ते उसके [कि हो जा,] बस हो जाता॥

—मं॰ ५। सि॰ २३। सू॰ ३६। आ॰ ५१।६५।८२॥

समीक्षक—अब सुनिये ऊटपटांग बातें! पग कभी गवाही दे सकते हैं? ख़ुदा के सिवाय उस समय कौन था जिस को आज्ञा दी? किसने सुनी? और कौन बन गया? यदि न थी तो यह बात झूठी और जो थी तो वह बात—जो सिवाय ख़ुदा के कुछ चीज़ नहीं थी और ख़ुदा ने सब कुछ बना दिया—वह झूठी॥१४०॥

१४१. फिराया जावेगा उनके ऊपर पियाला शराब शुद्ध का॥ सपैद मज़ा देने वाली वास्ते पीने वालों के॥ समीप उनके बैठी होंगी नीचे आंख रखने वालियां सुन्दर आंखों वालियां॥ मानो कि वे अण्डे हैं छिपाये हुए॥ क्या बस हम नहीं मरेंगे॥ और अवश्य लूत निश्चय पैग़म्बरों से था॥ जब कि मुक्ति दी हमने उसको और लोगों उसके को सब को॥ परन्तु एक बुढ़िया पीछे रहने वालों में है॥ फिर मारा हम ने औरों को॥ —मं॰ ६। सि॰ २३। सू॰ ३७। आ॰ ४५।४६।४८।४९।

५८।१३३।१३४।१३५।१३६॥

समीक्षक—क्योंजी यहां तो मुसलमान लोग शराब को बुरा बतलाते हैं परन्तु इनके स्वर्ग में तो नदियों की नदियां बहती हैं। इतना अच्छा है कि यहां तो किसी प्रकार मद्य पीना तो छुड़ाया है, परन्तु यहां के बदले वहां उनके स्वर्ग में बड़ी खराबी है! मारे स्त्रियों के वहां किसी का चित्त स्थिर नहीं रहता होगा! और बड़े-बड़े रोग भी होते होंगे! यदि शरीर वाले होंगे तो अवश्य मरेंगे और जो शरीर वाले न होंगे, तो भोग विलास ही न कर सकेंगे। फिर उनके स्वर्ग में जाना व्यर्थ है। यदि लूत को पैग़म्बर मानते हैं तो जो बायबिल में लिखा है कि उससे उसकी लड़कियों ने समागम करके दो लड़के पैदा किये, इस बात को भी मानते हो वा नहीं? जो मानते हो, तो ऐसे को पैग़म्बर मानना व्यर्थ है। और जो ऐसे और ऐसे के सङ्गियों को खुदा मुक्ति देता है, तो वह ख़ुदा भी वैसा ही है। क्योंकि बुढ़िया की कहानी कहने वाला और पक्षपात से दूसरों को मारने वाला ख़ुदा कभी नहीं हो सकता। ऐसा ख़ुदा मुसलमानों ही के घर में रह सकता है, अन्यत्र नहीं॥१४१॥

१४२. बहिश्तें हैं सदा रहने की खुले हुए हैं दर उनके वास्ते उनके॥ तकिये किये हुए बीच उनके मंगावेंगे बीच इसके मेवे और पीने की वस्तु॥ और समीप होंगी उनके, नीचे रखने वालियां दृष्टि और दूसरों से समायु॥ बस सिज़दा किया फ़रिश्तों ने सबने॥ परन्तु शैतान ने न माना, अभिमान किया और था काफ़िरों से॥ ऐ शैतान किस वस्तु ने रोका तुझको यह कि सिज़दा करे वास्ते उस वस्तु के कि बनाया मैंने साथ दोनों हाथ अपने के, क्या अभिमान किया तूने वा था तू बड़े अधिकार वालों से॥ कहा कि मैं अच्छा हूँ उस वस्तु से, उत्पन्न किया तूने मुझको आग से, उसको मिट्टी से॥ कहा बस निकल इन आसमानों में से, बस निश्चय तू चलाया गया है॥ निश्चय ऊपर तेरे लानत है मेरी दिन जज़ा तक॥ कहा ऐ मालिक मेरे, ढील दे उस दिन तक कि उठाये जावेंगे मुर्दे॥ कहा कि बस निश्चय तू ढील दिये गयों से है॥ उस दिन समय ज्ञात तक॥ कहा कि बस क़सम है प्रतिष्ठा तेरी की, अवश्य गुमराह करूंगा उनको मैं इकट्ठे॥

—मं॰ ६। सि॰ २३। सू॰ ३८। आ॰ ५०।५१।

५२। ७३। ७४।७५।७६।७७।७८।७९।८०।८१।८२॥

समीक्षक—यदि वहां जैसे कि क़ुरान में बाग़ बगीचे नहरें मकानादि ये लिखा, हैं, वैसे हैं तो वे न सदा से थे, न सदा रह सकते हैं क्योंकि जो संयोग से पदार्थ होता है वह संयोग के पूर्व न था, अवश्यम्भावी वियोग के अन्त में न रहेगा। जब वह बहिश्त ही न रहेगा तो उसमें रहने वाले सदा क्योंकर रह सकते हैं? क्योंकि ‘गादी, तकिया, मेवे और पीने के पदार्थ वहां मिलेंगे’ लिखा है। इससे यह सिद्ध होता है कि जिस समय मुसलमानों का मज़हब चला, उस समय अर्बदेश विशेष धनाढ्य न था, इसीलिये मुहम्मद साहेब ने तकिया आदि की कथा सुनाकर ग़रीबों को अपने मत में फसा लिया और जहां स्त्रियां हैं वहां निरन्तर सुख कहां? वे स्त्रियां वहां कहां से आई हैं? अथवा बहिश्त की रहीस [रहनेवाली] हैं? यदि आई हैं तो जावेंगी और जो वहीं की रहीस हैं तो क़यामत के पूर्व क्या करती थीं? क्या निकम्मी अपनी उमर को बहा रही थीं? अब देखिये खुदा का तेज! कि जिसका हुक्म अन्य सब फ़रिश्तों ने माना और आदम साहेब को नमस्कार किया और शैतान ने न माना! खुदा ने शैतान से पूछा कहा कि मैंने तुझ को अपने दोनों हाथों से बनाया, तू अभिमान न कर। इससे यह सिद्ध हुआ कि क़ुरान का ख़ुदा दो हाथ वाला मनुष्य था। इसलिये वह व्यापक वा सर्वशक्तिमान् कभी नहीं हो सकता। और शैतान ने सत्य कहा कि मैं आदम से उत्तम हूं, इस पर खुदा ने गुस्सा क्यों किया? क्या आसमान ही खुदा का घर है पृथिवी में नहीं? तो क़ाबे को ख़ुदा का घर प्रथम क्यों लिखा? भला परमेश्वर अपने में से वा सृष्टि में से अलग कैसे निकाल सकता है? और वह सृष्टि सब परमेश्वर की है इससे स्पष्ट विदित हुआ कि क़ुरान का खुदा बहिश्त का ज़िम्मेदार था। खुदा ने उसको लानत धिक्कार दिया और कैद कर लिया, शैतान ने कहा कि हे मालिक! मुझ को क़यामत तक छोड़ दे। खुदा ने खुशामद से छोड़ दिया क़यामत के दिन तक। जब शैतान छूटा तो खुदा से कहता है कि अब मैं खूब बहकाऊंगा और ग़दर मचाऊंगा। तब खुदा ने कहा कि मैं, जितने को तू बहकावेगा, दोज़ख में डाल दूंगा और तुझ को भी। अब सज्जन लोगो विचारिये! कि शैतान को बहकाने वाला खुदा है वा आप से वह बहका? यदि खुदा ने बहकाया, तो वह शैतान का शैतान ठहरा। यदि शैतान स्वयं बहका, तो अन्य जीव भी स्वयं बहकेंगे, शैतान की जरूरत नहीं! और जिससे इस शैतान बाग़ी को खुदा ने खुला छोड़ दिया, इससे विदित हुआ कि वह भी शैतान का शरीक़, अधर्म कराने में हुआ। यदि स्वयं चोरी कराके दण्ड देवे, तो उसके अन्याय का कुछ भी पारावार नहीं॥१४२॥

१४३. अल्लाह क्षमा करता है पाप सारे, निश्चय वह है क्षमा करने वाला दयालु॥ और पृथिवी सारी मूठी में है उसकी दिन क़यामत के और आसमान लपेटे हुए हैं बीच दाहिने हाथ उसके के॥ और चमक जावेगी पृथिवी साथ प्रकाश मालिक अपने के और रक्खे जावेंगे कर्मपत्र और लाया जावेगा पैग़म्बरों को और गवाहों को और फैसला किया जावेगा॥

—मं॰ ६। सि॰ २४। सू॰ ३९। आ॰ ५३।६७।६९॥

समीक्षक—यदि समग्र पापों को खुदा क्षमा करता है तो जानो सब संसार को पापी बनाता और दयाहीन है, क्योंकि एक दुष्ट पर दया और क्षमा करने से वह अधिक दुष्टता करेगा और अन्य बहुत धर्मात्माओं को दुःख पहुँचावेगा। यदि किञ्चित् भी अपराध क्षमा किया जावे, तो अपराध ही अपराध जगत् में छा जावे। क्या परमेश्वर अग्निवत् प्रकाश वाला है? और कर्मपत्र कहां जमा रहते हैं और कौन लिखता है? यदि पैगम्बरों और गवाहों के भरोसे ख़ुदा न्याय करता है, तो वह असर्वज्ञ और असमर्थ है। यदि वह अन्याय नहीं करता, न्याय ही करता है, तो कर्मों के अनुसार करता होगा। वे कर्म पूर्वापर वर्त्तमान जन्मों के हो सकते हैं, तो फिर क्षमा करता, दिलों पर ताला लगाता और शिक्षा न करनी, शैतान से बहकवाना, दौरा सुपुर्द रखना केवल अन्याय है॥१४३॥

१४४. उतारना किताब का अल्लाह ग़ालिब जानने वाले की ओर से है॥ क्षमा करने वाला पापों का और स्वीकार करने वाला तोबाः का॥

—मं॰ ६। सि॰ २४। सू॰ ४०। आ॰ २।३॥

समीक्षक—यह बात इसलिये है कि भोले लोग अल्लाह के नाम से इस पुस्तक को मान लेवें कि जिसमें थोड़ा सा सत्य छोड़ असत्य भरा है और वह सत्य भी असत्य के साथ मिलकर बिगड़ा सा है। इसीलिये क़ुरान और कुरान का ख़ुदा और इस को मानने वाले पाप बढ़ानेहारे और पाप करने-कराने वाले हैं, क्योंकि ‘पाप की क्षमा करनी’ अत्यन्त अधर्म है। किन्तु इसी से मुसलमान लोग पाप और उपद्रव करने में कम डरते हैं॥१४४॥

१४५. बस नियत किया उसको सात आसमान बीच दो दिन के, और डाल दिया हमने बीच उसके काम उसका॥ यहाँ तक कि जब जावेंगे उसके पास साक्षी देंगे ऊपर उनके कान उनके और आंखें उनकी और चमड़े उनके, उनके कर्म से॥ और कहेंगे वास्ते चमड़े अपने के क्यों साक्षी दी तूने ऊपर हमारे, कहेंगे कि बुलाया है हम को अल्लाह ने जिसने बुलाया हर वस्तु को॥ अवश्य जिलाने वाला है मुर्दों को॥                 —मं॰ ६। सि॰ २४। सू॰ ४१। आ॰ १२।२०।२१।३९॥

समीक्षक—वाह जी वाह मुसलमानो! तुम्हारा ख़ुदा जिस को तुम सर्वशक्तिमान् मानते हो, तो वह सात आसमानों को दो दिन में बना सका? और जो सर्वशक्तिमान् है वह क्षणमात्र में सब को बना सकता है। भला कान, आंख और चमड़े को ईश्वर ने जड़ बनाया है वे साक्षी कैसे दे सकेंगे? यदि साक्षी दिलावे, तो उसने प्रथम जड़ क्यों बनाया? और अपना पूर्वापर नियमविरुद्ध क्यों किया? एक इससे भी बढ़के मिथ्या बात यह कि जब जीवों पर साक्षी दी, तब वे जीव अपने-अपने चमड़े से पूछने लगे कि तूने हमारे पर साक्षी क्यों दी? चमड़ा बोला कि खुदा ने दिलायी, मैं क्या करूं! भला यह बात कभी हो सकती है? जैसे कोई कहे कि बन्ध्या के पुत्र का मुख मैंने देखा, यदि पुत्र है तो बन्ध्या क्यों? जो बन्ध्या है, तो उसके पुत्र ही होना असम्भव है। इसी प्रकार की यह भी मिथ्या बात है। यदि वह मुर्दों को जिलाता है, तो प्रथम मारा ही क्यों? क्या आप भी मुर्दा हो सकता है वा नहीं? यदि नहीं हो सकता, तो मुर्देपन को बुरा क्यों समझता है? और क़यामत की रात तक मृतक जीव किस मुसलमान के घर में रहे? और दौरासुपुर्द खुदा ने विना अपराध क्यों रक्खा? शीघ्र न्याय क्यों न किया? ऐसी-ऐसी बातों से ईश्वरता में बट्टा लगता है॥१४५॥

१४६. वास्ते उस के कुंजियां हैं आसमानों की और पृथिवी की, खोलता है भोजन जिस के वास्ते चाहता है और तंग करता है॥ उत्पन्न करता है जो कुछ चाहता है और देता है जिस को चाहे बेटियां और देता है जिसको [चाहे] बेटे॥ वा मिला देता है उनको बेटे और बेटियां और जिसको चाहे बांझ॥ और नहीं है शक्ति किसी आदमी की कि बात करे उससे अल्लाह परन्तु जी में डालने कर वा पीछे परदेर्ि के से वा भेजे फ़रिश्ते पैग़ाम लाने वाला॥

—मं॰ ६। सि॰ २५। सू॰ ४२। आ॰ १२।४९।५०।५१॥

समीक्षक—खुदा के पास कुंजियों का भण्डार भरा होगा। क्योंकि सब ठिकाने के ताले खोलने होते होंगे! यह लड़कपन की बात है। क्या जिसको चाहता है उसको विना पुण्य कर्म के ऐश्वर्य्य देता है और तंग करता है? यदि ऐसा है तो वह बड़ा अन्यायकारी है। अब देखिये क़ुरान बनाने वाले की चतुराई! कि जिस से स्त्रीजन भी मोहित होके फसें। यदि जो कुछ चाहता है उत्पन्न करता है, तो दूसरे ख़ुदा को उत्पन्न कर सकता है वा नहीं? यदि नहीं कर सकता, तो सर्वशक्तिमत्ता यहां पर अटक गई। भला मनुष्यों को तो जिन को चाहे बेटे बेटियां ख़ुदा देता है परन्तु मुर्गे, मच्छी, सूअर आदि जिन के बहुत बेटा बेटियां होती हैं, कौन देता है? और स्त्री-पुरुष के समागम के विना क्यों नहीं देता? किसी को अपनी इच्छा से बांझ रख के दुःख क्यों देता है? वाह! क्या खुदा तेजस्वी है कि उस के सामने कोई बात ही नहीं कर सकता! परन्तु उसने पहिले कहा है कि पर्दा डाल के बात कर सकता है वा फ़रिश्ते लोग ख़ुदा से बात करते हैं अथवा पैग़म्बर। जो ऐसी बात है, तो फ़रिश्ते और पैग़म्बर खूब अपना मतलब करते होंगे! यदि कोई कहे ख़ुदा सर्वज्ञ सर्वव्यापक है, तो ‘परदे से बात करना अथवा डाक के तुल्य खबर मंगा के जानना’ लिखना व्यर्थ है। और जो ऐसा ही है, तो वह ख़ुदा ही नहीं, किन्तु कोई चालाक मनुष्य होगा। इसीलिये यह क़ुरान ईश्वरकृत कभी नहीं हो सकता॥१४६॥

१४७. और जब आया ईसा साथ प्रमाण प्रत्यक्ष के॥

—मं॰ ६। सि॰ २५। सू॰ ४३। आ॰ ६३॥

समीक्षक—यदि ईसा भी भेजा हुआ ख़ुदा का है तो उस के उपदेश से विरुद्ध क़ुरान ख़ुदा ने क्यों बनाई? और क़ुरान से विरुद्ध अञ्जील क्यों की? इसीलिये ये किताबें ईश्वरकृत नहीं हैं॥१४७॥

१४८. पकड़ो उस को बस घसीटो उस को बीचों बीच दोज़ख़ के॥ इसी प्रकार रहेंगे और ब्याह देंगे उन को साथ गोरियों अच्छी आंख वालियों के॥

—मं॰ ६। सि॰ २५। सू॰ ४४। आ॰ ४७।५४॥

समीक्षक—वाह! क्या ख़ुदा न्यायकारी होकर पकड़ाता और घसीटवाता है प्राणियों को? जब मुसलमानों का ख़ुदा ही ऐसा है तो उसके उपासक मुसलमान अनाथ निर्बलों को पकड़ें घसीटें तो इस में क्या आश्चर्य है?।। और वह संसारी मनुष्यों के समान विवाह भी कराता है, जानो कि मुसलमानों का पुरोहित ही है॥१४८॥

१४९. बस जब तुम मिलो उन लोगों से कि काफ़िर हुए बस मारो गर्दनें उनकी यहां तक कि जब चूर कर दो उन को बस कठिन है क़ैद करना॥ और बहुत बस्तियां हैं कि वे बहुत कठिन थीं शक्ति में बस्ती तेरी से, जिस ने निकाल दिया तुझ को मारा हम ने उन को, बस न कोई हुआ सहाय देने वाला उन का॥ तारीफ़ उस बहिश्त की कि प्रतिज्ञा किये गये हैं परहेज़गार, बीच उस के नहरें हैं बिन बिगड़े पानी की, और नहरें हैं दूध की कि नहीं बदला मज़ा उन का, और नहरें हैं शराब की मज़ा देने वालों के, और नहरें हैं शहद साफ़ किये गये की, और वास्ते उनके बीच उस के मेवे हैं प्रत्येक प्रकार से दान मालिक उनके से॥

—मं॰ ६। सि॰ २६। सू॰ ४७। आ॰ ४।१३।१५॥

समीक्षक—इसी से यह क़ुरान, ख़ुदा और मुसलमान गदर मचाने, सब को दुःख देने, अपना मतलब साधने वाले दयाहीन हैं। जैसा यहां लिखा है वैसा ही दूसरा कोई, दूसरा मत वाला मुसलमानों पर करे तो मुसलमानों को वैसा ही दुःख जैसा कि अन्य को दुःख देते हैं, हो वा नहीं? और [खुदा] बड़ा पक्षपाती है कि जिन्होंने मुहम्मद साहेब को निकाल दिया, उन को ख़ुदा ने मारा। भला! जिस में शुद्ध पानी, दूध, मद्य और शहद की नहरें हैं वह संसार से अधिक नहीं हो सकता। और दूध की नहरें कभी नहीं हो सकती, क्योंकि वह थोड़े समय में बिगड़ जाता है। इसीलिये बुद्धिमान् लोग क़ुरान के मत को नहीं मानते॥१४९॥

१५०. जब कि हिलाई जावेगी पृथिवी हिलाये जाने कर॥ उड़ाये जावेंगे पहाड़ उड़ाये जाने कर॥ बस हो जावेंगे भुनुगे टुकड़े-टुकड़े॥ बस साहब दाहिने ओर वाले क्या हैं साहब दाहिनी ओर के॥ और वामी ओर वाले क्या हैं, वामी ओर वाले॥ ऊपर पलङ्ग सोने के तारों से बुने हुए हैं। तकिये किये हुए हैं ऊपर उनके आमने सामने॥ और फिरेंगे ऊपर उन के लड़के सदा रहने वाले॥ साथ आबखोंरों के और आफ़ताबों के और प्यालों के शराब साफ़ से॥ नहीं माथा दुखाये जावेंगे उस से और न विरुद्ध बोलेंगे॥ और मेवे उस क़िस्म से कि पसन्द करें। और गोश्त ज़ानवर पक्षियों के उस क़िस्म से कि पसन्द करें॥ और वास्ते उनके औरतें हैं अच्छी आंखों वाली॥ मानिन्द मोतियों छिपाये हुओं की॥ और बिछौने बड़े॥ निश्चय हम ने उत्पन्न किया है औरतों को कुमारी एक प्रकार का उत्पन्न करना।। सुहागवालियां बराबर अवस्था वालियां॥ बस भरने वाले हो उस से पेटों को॥ बस क़सम खाता हूं मैं साथ गिरने तारों के॥

—मं॰ ७। सि॰ २७। सू॰ ५६। आ॰ ४।५।६।८। ९।

१५। १६।१७।१८।१९।२०।२१।२२।२३।३४।३५।३६। ३७।५३।७५॥

समीक्षक—अब देखिये क़ुरान बनाने वाले की लीला को! भला पृथिवी तो हिलती ही रहती है उस समय भी हिलती रहेगी। इस से यह सिद्ध होता है कि क़ुरान बनाने वाला पृथिवी को स्थिर जानता था! भला पहाड़ों को क्या पक्षीवत् उड़ा देगा? यदि भुनुगे हो जावेंगे तो भी सूक्ष्म शरीरधारी रहेंगे तो फिर उनका दूसरा जन्म क्यों नहीं? वाह जी! जो ख़ुदा शरीरधारी न होता तो उसके दाहिनी ओर और बाईं ओर कैसे खड़े हो सकते? जब वहां पलङ्ग सोने के तोरों से बुने हुए हैं तो बढ़ई सुनार भी वहां रहते होंगे और खटमल काटते होंगे जो उनको रात्रि में सोने भी नहीं देते होंगे। क्या वे तक़िये लगाकर निकम्मे बहिश्त में बैठे ही रहते हैं वा कुछ काम किया करते हैं? यदि बैठे ही रहते होंगे, तो उनको अन्न के पचन न होने से वे रोगी होकर शीघ्र मर भी जाते होंगे? और जो काम किया करते होंगे, तो जैसे मेहनत मज़दूरी यहां करते हैं, वैसे ही वहां मेहनत परिश्रम करके निर्वाह करते होंगे फिर यहां से वहां बहिश्त में विशेष क्या है? कुछ भी नहीं। यदि वहां लड़के सदा रहते हैं तो उन के मा बाप भी रहते होंगे और सासु श्वशुर भी रहते होंगे तब तो बड़ा भारी शहर बसता होगा फिर मल मूत्रादि के बढ़ने से रोग भी बहुत से होते होंगे क्योंकि जब मेवे खावेंगे, गिलासों में पानी पीवेंगे, और प्यालों से मद्य पीवेंगे न उन का शिर दूखेगा और न कोई विरुद्ध बोलेगा। यथेष्ट मेवा खावेंगे और जानवरों तथा पक्षियों के मांस भी खावेंगे, तो अनेक प्रकार के दुःख, पक्षी, जानवर वहाँ होंगे, हत्या होगी और हाड़ जहां तहां बिखरे रहेंगे और कसाइयों की दुकानें भी होंगी। वाह क्या कहना इनके बहिश्त की प्रशंसा! कि वह अरब देश से भी बढ़ कर दीखती है। और जो मद्य मांस पी खाके उन्मत्त होते हैं, इसीलिये अच्छी-अच्छी स्त्रियां और लौंडे भी वहां अवश्य रहने चाहिये, नहीं तो ऐसे नशेबाजों के शिर में गरमी चढ़के प्रमत्त हो जावेंगे। अवश्य बहुत स्त्री पुरुषों के बैठने सोने के लिये बिछौने बड़े-बड़े चाहियें। जब ख़ुदा कुमारी बहिश्त में उत्पन्न करता है, तभी कुमारे लड़कों को भी उत्पन्न करता है। भला! कुमारियों का तो विवाह जो यहां से उम्मेदवार होकर गये हैं, उनके साथ ख़ुदा ने कराया, परन्तु उन सदा रहने वाले लड़कों का किन्हीं कुमारियों के साथ विवाह न लिखा, तो क्या वे भी उन्हीं उम्मेदवारों के साथ कुमारीवत् दे दिये? इसकी व्यवस्था कुछ भी न लिखी। यह ख़ुदा में बड़ी भूल क्यों हुई? यदि बराबर अवस्थावाली सुहागिन स्त्रियां पतियों को पाके बहिश्त में रहती हैं, तो ठीक नहीं हुआ, क्योंकि स्त्री से पुरुष का आयु दूना, ढ़ाई गुना चाहिये। यह तो मुसलमानों के बहिश्त की कथा है! और नरक वाले सिंहोड़ अर्थात् थोर के वृक्षों को खा के पेट भरेंगे तो कण्टक वृक्ष भी दोज़ख़ में होंगे तो कांटे भी लगते होंगे, गर्म पानी पियेंगे इत्यादि दुःख दोज़ख़ में पावेंगे। क़सम का खाना प्रायः झूठे का काम है, सच्चों का नहीं। यदि ख़ुदा ही कसम खाता है तो वह भी झूठ से अलग नहीं हो सकता॥१५०॥

१५१. वही है जिसने उत्पन्न किया आसमानों को और पृथिवी को बीच छः दिनों के फिर करार पकड़ा ऊपर अर्श के।। ईमान लाओ साथ अल्लाह के और रसूल उसके के॥ कौन मनुष्य है कि उधार देवे अल्लाह को उधार अच्छा बस दुगुना करे उसको वास्ते उसके॥               —मं॰ ७। सि॰ २७। सू॰ ५७। आ॰ ४।७।११॥

समीक्षक—यदि छः दिनों में पृथिवी और आकाश को बनाकर आकाश में आराम किया तो वह शरीरधारी, एकदेशी, असमर्थ और थकनेवाला होने से ईश्वर ही नहीं हो सकता। यदि ईमान में पैग़म्बर भी शरीक है तो ख़ुदा का शरीक हुआ वा नहीं और मुसलमानों के मत में ख़ुदा के सिवाय पर भी ईमान रखना आवश्यक होने से लाशरीक ख़ुदा को कहना व्यर्थ है। क्या खुदा के खजाने में टोटा पड़ गया वा कोई लूट गया अथवा खुदा ने फैल फतूरी में नाश कर दिया कि जिस किसी से उधार मांगता है और दूना देना स्वीकार करता है। भला! ऐसी-ऐसी बातें ईश्वर और ईश्वरकृत पुस्तक की कभी हो सकती हैं॥१५१॥

१५२. अल्लाह ने क्रोध किया ऊपर काफिरों के और विशेष यहूदियों पर गालिब आया उनके शैतान बस भुला दी उनको याद ख़ुदा की ये लोग समुदाय शैतान के हैं॥                  —मं॰ ७। सि॰ २८। सू॰ ५८। आ॰ १५।१९॥

समीक्षक—यदि मुसलमानी मजहब को न मानें और वे अच्छे हों, उन पर ख़ुदा क्रोध करेगा तो अन्यायी होगा वा नहीं? और जो मुसलमानों में दुष्ट हों, उनसे प्रेम करेगा तो भी पक्षपाती होकर पापी होगा। यदि ख़ुदा की सृष्टि में शैतान प्रबल होता है और उसको ख़ुदा न पकड़, न दण्ड और न मार सकता है, इसीलिये ख़ुदा सर्वशक्तिमान् न्यायकारी भी नहीं है॥१५२॥

१५३. वह पृथिवी अल्लाह ने लूट की प्रकार से न बटवाई, हजरत के अखत्यार में रक्खी।। यह ही भेद रक्खा लूट में और फी में जो माल लड़ाई से हाथ लगा वह लूट पांचवां भाग अल्लाह की भेंट और चार भाग लश्कर को बांटने॥

—मं॰ ७। सि॰ २८। सू॰ ५९। आ॰ २।६॥

समीक्षक—क्या कहना है! तभी तो मुसलमान लोग लूट-मार और फिसाद करने में नहीं डरते कि जिनके ख़ुदा और पैगम्बर ने लूट की पृथिवी आदि का भी स्वीकार कर लिया। क्योंकि उस लूट के माल में से पांचवां भाग अल्लाह का भी है। क्या यह ख़ुदा वा पैग़म्बर लूट के कराने वाले नहीं हुए। ऐसे ख़ुदा और पैग़म्बर को कोई बुद्धिमान् न मान सकेगा। और क्या ऐसे की बात का प्रमाण हो सकता है?॥१५३॥

१५४. निश्चय अल्लाह मित्र रखता है उन लोगों को कि लड़ते हैं बीच मार्ग उसके के॥                   —मं॰ ७। सि॰ २८। सू॰ ५९। आ॰ ४॥

समीक्षक—वाह ठीक है! ऐसी-ऐसी बातों का उपदेश करके बिचारे अरब देश वासियों को सब से लड़ा के शत्रु बना कर दुःख परस्पर दिलाया और मज़हब का झंडा खड़ा करके लड़ाई फैलावे, ऐसे को ईश्वर, बुद्धिमान् कभी नहीं मान सकते। जो मनुष्य जाति में विरोध बढ़ावे वही सब को दुःखदाता होता है॥१५४॥

१५५. यदि कर्ज दो तुम अल्लाह को कर्ज अच्छा दुगुणा करेगा उसको वास्ते तुम्हारे क्षमा करेगा वास्ते तुम्हारे पाप॥

—मं॰ ७। सि॰ २८। सू॰ ६४। आ॰ १७॥

समीक्षक—यह कर्ज का लेना-देना सब मुहम्मद साहेब के मतलब की बात है। जैसे मूर्तिपूजक मूर्ति के नाम से लोगों से धन लेकर स्वकार्य सिद्ध करते हैं, ऐसी ही मुहम्मद साहेब की लीला है। क्योंकि ईश्वर को कर्ज लेने का कोई भी प्रयोजन नहीं॥१५५॥

नोट—हजरत ने एक बीबी अपनी मैकूफ कर दी खातर से और बीबियों से। हजरत की मर्यम नामी एक बांदी से प्रीति बहुत थी। और इस बात को उनकी एक बीबी ने जानकर रोका। हजरत ने खफा होकर उसको तलाक दे दी। ये आयत हजरत की औरतों की तरफ है। किसी दिन कोई बीबी रूस गई होगी, उस बात पर यह आयत उतरी कि ऐ नबी की स्त्रियो! यह घमंड मत करो कि पैग़म्बर के लिये हम ही हैं, नहीं सिवाय तुम्हारे और भी बीबियां बदल सकते हैं।

१५६. ऐ नबी क्यों हराम करता है उस वस्तु को कि हलाल किया है ख़ुदा ने तेरे लिये, चाहता है तू प्रसन्नता बीबियों अपनी की, और अल्लाह क्षमा करने वाला दयालु है॥ जल्दी है मालिक उस का जो वह तुम को छोड़ देते तो यह कि उस को तुम से अच्छी मुसलमान और ईमान वालियाँ बीबियाँ बदल दे सेवा करने वालियाँ तोबाः करने वालियाँ भक्ति करने वालियाँ रोज़ा रखने वालियाँ पुरुष देखी हुई और बिन देखी हुई॥       —मं॰ ७। सि॰ २८। सू॰ ६६। आ॰ १।५॥

समीक्षक—ध्यान देकर देखना चाहिये कि ख़ुदा क्या हुआ मुहम्मद साहेब के घर का भीतरी और बाहरी प्रबन्ध करने वाला भृत्य ठहरा!!

प्रथम आयत पर दो कहानियाँ हैं—एक तो यह कि मुहम्मद साहेब को शहद का शर्बत प्रिय था। उनकी कई बीबियाँ थीं उनमें से एक के घर पीने में देर लगी तो दूसरियों को असह्य प्रतीत हुआ, उनके कहने सुनने के पीछे मुहम्मद साहेब सौगन्द खा गये कि हम न पीवेंगे।

दूसरी यह कि उनकी कई बीबियों में से एक की बारी थी। उसके यहाँ रात्री को गये तो वह न थी; अपने बाप के यहाँ गई थी। मुहम्मद साहेब ने एक लौंडी अर्थात् दासी को बुला कर पवित्र किया। जब बीबी को इसकी ख़बर मिली तो अप्रसन्न हो गई। तब मुहम्मद साहेब ने सौगन्द खाई कि मैं ऐसा न करूँगा। और बीबी से भी कह दिया कि तुम किसी से यह बात मत कहना। बीबी ने स्वीकार किया कि न कहूँगी। फिर उन्होंने दूसरी बीबी से जा कहा। इस पर यह आयत ख़ुदा ने उतारी “जिस वस्तु को हमने तेरे पर हलाल किया उसको तू हराम क्यों करता है?”

बुद्धिमान् लोग विचारें कि भला कहीं ख़ुदा भी किसी के घर का निमटेरा करता फिरता है? और मुहम्मद साहेब के तो आचरण इन बातों से प्रकट ही हैं, कहने की क्या बात है।

और दूसरी आयत से प्रतीत होता है कि मुहम्मद साहेब से उनकी कोई बीबी अप्रसन्न हो गई होगी, उसपर खुदा ने यह आयत उतारकर उसको धमकाया होगा कि यदि तू गड़बड़ करेगी और मुहम्मद साहेब तुझे छोड़ देंगे तो उनका खुदा तुझसे अच्छी बीबियाँ देगा कि जो पुरुष से न मिली हों।

जिस मनुष्य को तनिक-सी बुद्धि है वह विचार ले सकता है कि ये खुदा-वुदा के काम हैं वा अपने प्रयोजन सिद्धि के! ऐसी-ऐसी बातों से ठीक सिद्ध है कि खुदा कोई नहीं कहता था, केवल देश-काल देखकर अपने प्रयोजन के सिद्ध होने के लिए खुदा की तरफ़ से मुहम्मद साहेब कह देते थे। जो लोग खुदा ही की तरफ़ लगाते हैं उनको हम क्या सब बुद्धिमान् यही कहेंगे कि खुदा क्या ठहरा मानो मुहम्मद साहेब के लिए बीबियाँ लानेवाला नाई ठहरा!!!॥

भला! जो अनेक स्त्रियों को रक्खे वह ईश्वर का भक्त वा पैग़म्बर कैसे हो सके? और जो एक स्त्री का पक्षपात से अपमान करे और दूसरी का मान्य करे, वह पक्षपाती होकर अधर्मी क्यों नहीं और जो बहुत सी स्त्रियों से भी सन्तुष्ट न होकर, बांदियों के साथ फसे, उन को लज्जा, भय और धर्म कहां से रहे? किसी ने कहा है कि—

कामातुराणां न भयं न लज्जा

जो कामी मनुष्य हैं उन को अधर्म से भय वा लज्जा नहीं होती।

और इन का ख़ुदा भी मुहम्मद साहेब की स्त्रियों और पैग़म्बर के झगड़े को फैसला करने में जानो सरपञ्च बना है। अब बुद्धिमान् लोग विचार लें कि यह क़ुरान किसी विद्वान् वा ईश्वरकृत है वा किसी अविद्वान् मतलबसिन्धु की बनाई? स्पष्ट विदित हो जायगा॥१५६॥

१५७. ऐ नबी! झगड़ा कर काफिरों और गुप्त शत्रुओं से और सख्ती कर ऊपर उनके॥                   —मं॰ ७। सि॰ २८। सू॰ ६६। आ॰ ९॥

समीक्षक—और देखिये मुसलमानों के ख़ुदा की लीला! अन्य मत वालों से लड़ने के लिये पैग़म्बर और मुसलमानों को उचकाता है इसीलिये आज तक मुसलमान लोग उपद्रव करने में प्रवृत्त रहते हैं। परमात्मा मुसलमानों पर कृपादृष्टि करे, जिस से ये लोग उपद्रव करना छोड़ के, सब से मित्रता से वर्त्तें॥१५७॥

१५८. फट जावेगा आसमान, बस वह उस दिन सुस्त होगा॥ और फ़रिश्ते होंगे ऊपर किनारों उसके के, और उठावेंगे तख़्त मालिक तेरे का ऊपर अपने उस दिन आठ जन॥ उस दिन सामने लाये जाओगे तुम, न छिपी रहेगी कोई बात छिपी हुई॥ बस जो कोई दिया गया कर्मपत्र अपना बीच दाहिने हाथ अपने के, बस कहेगा लो पढ़ो कर्मपत्र मेरा॥ और जो कोई दिया गया कर्मपत्र बीच बांये हाथ अपने के, बस कहेगा हाय न दिया गया होता मैं कर्मपत्र अपना॥

—मं॰ ७। सि॰ २९। सू॰ ६९। आ॰ १६।१७।१८।१९।२५॥

समीक्षक—वाह क्या फ़िलासफ़ी और न्याय की बात है! भला आकाश भी कभी फट सकता है? क्या वह वस्त्र के समान है जो फट जावे? यदि ऊपर के लोक को आसमान कहते हैं तो यह बात विद्या से विरुद्ध है। अब क़ुरान का ख़ुदा शरीरधारी होने में कुछ संदिग्ध न रहा, क्योंकि तख़्त पर बैठना, आठ कहारों से उठवाना, विना मूर्त्तिमान् के कुछ भी नहीं हो सकता? और सामने वा पीछे भी आना जाना मूर्त्तिमान् ही का हो सकता है। जब वह मूर्त्तिमान् है, तो एकदेशी होने से सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् नहीं हो सकता और सब जीवों के सब कर्मों को कभी नहीं जान सकता। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि पुण्यात्माओं के दाहिने हाथ में पत्र देना, बँचवाना, बहिश्त में भेजना और पापात्माओं के बांये हाथ में कर्मपत्र का देना, नरक में भेजना, कर्मपत्र बाँच के न्याय करना सर्वज्ञ का काम नहीं। यह सब लीला लड़केपन की है॥१५८॥

१५९. चढ़ते हैं१ फ़रिश्ते और रूह तरफ़ उस की वह अज़ाब होगा बीच उस दिन के कि है परिमाण उसका पचास हज़ार वर्ष॥ जब कि निकलेंगे क़ब्रों में से दौड़ते हुए मानो कि वे बुतों के स्थानों की ओर दौड़ते हैं॥

—मं॰ ७। सि॰ २९। सू॰ ७०। आ॰ ४।४३॥

समीक्षक—यदि पचास हज़ार वर्ष का दिन का परिमाण है, तो पचास हज़ार वर्ष की रात्रि क्यों नहीं? यदि उतनी बड़ी रात्रि नहीं है, तो उतना बड़ा दिन कभी नहीं हो सकता। रात्रि में न्याय करना अच्छा नहीं, किन्तु दिन ही न्याय के लिये है। क्या पचास हज़ार वर्षों तक ख़ुदा फ़रिश्ते और कर्मपत्र वाले खड़े-खड़े वा बैठे अथवा जागते ही रहेंगे? यदि ऐसा है, तो सब रोगी हो कर पुनः मर ही जायेंगे। क्या क़ब्रों से निकल कर ख़ुदा की कचहरी की ओर दौड़ेंगे? उन के पास सम्मन क़ब्रों में क्योंकर पहुंचा? और उन बिचारों को जो कि पुण्यात्मा, पापात्मा हैं इतने समय तक सभी को दौरे सुपुर्द क़ब्रों में कैद क्यों रक्खा? और आजकाल ख़ुदा की कचहरी बन्ध होगी और ख़ुदा तथा फ़रिश्ते निकम्मे बैठे होंगे? अथवा क्या काम करते हैं? अपने-अपने स्थानों में बैठे इधर-उधर घूमते, सोते, नाच-तमाशा देखते वा ऐश-आराम कर रहे होंगे। ऐसा अन्धेर किसी के राज में न होगा। ऐसी-ऐसी बातों को सिवाय जंगलियों के दूसरा कौन मानेगा?॥१५९॥

१६०. निश्चय उत्पन्न किया है तुम को कई प्रकार से॥ क्या नहीं देखा तुमने कैसे उत्पन्न किया अल्लाह ने आसमानों को ऊपर तले॥ और किया चांद को बीच उन के प्रकाशक और किया सूर्य्य को दीपक॥

—मं॰ ७। सि॰ २९। सू॰ ७१। आ॰ १४।१५।१६॥

समीक्षक—यदि जीवों को ख़ुदा ने उत्पन्न किया है तो वे नित्य, अमर कभी नहीं रह सकते? फिर बहिश्त में सदा क्योंकर रह सकेंगे? जो उत्पन्न होता है, वह वस्तु अवश्य नष्ट हो जाता है। आसमान को ऊपर तले कैसे बना सकता है? क्योंकि वह निराकार और विभु पदार्थ है। यदि दूसरी चीज़ का नाम आकाश रखते हो तो, भी उस का आकाश नाम रखना व्यर्थ है। यदि ऊपर तले आसमानों को बनाया है, तो उन सब के बीच में चाँद सूर्य्य कभी नहीं रह सकते। जो बीच में रक्खा जाय, तो एक ऊपर और एक नीचे का पदार्थ प्रकाशित हो। दूसरे से ले कर सब में अन्धकार रहना चाहिये। ऐसा नहीं दीखता, इसलिये यह बात सर्वथा मिथ्या है॥१६०॥

१६१. और यह कि मसजिदें वास्ते अल्लाह के हैं, बस मत पुकारो साथ अल्लाह के किसी को॥             —मं॰ ७। सि॰ २९। सू॰ ७२। आ॰ १८॥

समीक्षक—यदि यह बात सत्य है तो मुसलमान लोग ‘लाइलाह इल्लिलाः मुहम्मदर्रसूलल्लाः’ इस कलमे में ख़ुदा के साथ मुहम्मद साहेब को क्यों पुकारते हैं? यह बात क़ुरान से विरुद्ध है और जो विरुद्ध नहीं करते, तो इस क़ुरान की बात को झूठ करते हैं। जब मसजिदें ख़ुदा के घर हैं, तो मुसलमान महाबुतपरस्त हुए। क्योंकि जैसे पुराणी, जैनी छोटी सी मूर्त्ति को ईश्वर का घर मानने से बुतपरस्त ठहरते हैं, ये लोग क्यों नहीं?॥१६१॥

१६२. इकट्ठा किया जावेगा सूर्य और चाँद॥

—मं॰ ७। सि॰ २९। सू॰ ७५। आ॰ ९॥

समीक्षक—भला सूर्य्य चाँद कभी इकट्ठे हो सकते हैं? देखिये! यह कितनी बेसमझ की बात है। और सूर्य चन्द्र ही के इकट्ठे करने में क्या प्रयोजन तथा अन्य सब लोकों को इकट्ठे न करने में क्या युक्ति है? ऐसी-ऐसी असम्भव बातें परमेश्वरकृत कभी हो सकती हैं? विना अविद्वानों के अन्य किसी विद्वान् की भी नहीं होतीं॥१६२॥

१६३. और फिरेंगे ऊपर उन के लड़के सदा रहने वाले, जब देखेगा तू उन को, अनुमान करेगा तू उन को मोती बिखरे हुए॥ और पहनाये जावेंगे कंगन चांदी के और पिलावेगा उन को रब उनका शराब तहूरा॥

—मं॰ ७। सि॰ २९। सू॰ ७६। आ॰ १९।२१॥

समीक्षक—क्योंजी मोती के वर्ण से लड़के किस लिये वहां रक्खे जाते हैं? क्या जवान लोग सेवा वा स्त्रीजन उन को तृप्त नहीं कर सकतीं? क्या आश्चर्य है कि जो यह महा बुरा कर्म लड़कों के साथ दुष्टजन करते हैं उस का मूल यही क़ुरान का वचन हो! और बहिश्त में स्वामी सेवकभाव होने से स्वामी को आनन्द और सेवक को परिश्रम होने से स्वर्ग में दुःख तथा पक्षपात क्यों होता है? और जब ख़ुदा ही उन को मद्य पिलावेगा तो वह भी उन का सेवकवत् ठहरेगा, फिर ख़ुदा की बड़ाई क्योंकर रह सकेगी? और वहां बहिश्त में स्त्री पुरुष का समागम और गर्भस्थिति और लड़के-बाले भी होते हैं वा नहीं? यदि नहीं होते तो उन का विषयसेवन करना व्यर्थ हुआ और जो होते हैं तो वे जीव कहां से आये? और विना ख़ुदा की सेवा के बहिश्त में क्यों जन्मे? यदि जन्मे तो उन बेचारों को विना ईमान लाने और ख़ुदा की भक्ति किये विना बहिश्त मुफ्त मिल गया। यह कितना बड़ा अन्याय है। किन्हों को तो ईमान लाये और किन्हीं को विना धर्म के सुख मिल जाने से दूसरा बड़ा अन्याय कौन सा होगा?॥१६३॥

१६४. बदला दिये जावेंगे कर्मानुसार॥ और प्याले हैं भरे हुए॥ जिस दिन खड़े होंगे रूह और फ़रिश्ते सफ़ बांध कर॥

—मं॰ ७। सि॰ ३०। सू॰ ७८। आ॰ २६।३४।३८॥

समीक्षक—यदि कर्मानुसार फल दिया जाता है तो सदा बहिश्त में रहने वाले हूरें, फ़रिश्ते और मोती के सदृश लड़कों को कौन कर्म के अनुसार सदा के लिये बहिश्त मिला? जब प्याले भर-भर शराब पीयेंगे तो मस्त होकर क्यों न लड़ेंगे? और रूह निराकार होने से वहां खड़ी क्योंकर हो सकेगी? और ख़ुदा उस समय खड़ा होगा वा बैठा?॥१६४॥

१६५. जब कि सूर्य लपेटा जावे॥ और जब कि तारे गदले हो जावें॥ और जब कि पहाड़ चलाये जावें॥ और जब आसमान की खाल उतारी जावे॥

—मं॰ ७। सि॰ ३०। सू॰ ८१। आ॰ १।२।३।११॥

समीक्षक—यह बड़ी बेसमझ की बात है कि गोल सूर्यलोक कैसे लपेटा जावेगा? और तारे गदले क्योंकर हो सकेंगे? और पहाड़ जड़ होने से चलेंगे कैसे? और आकाश को क्या पशु समझा कि उस की खाल निकाली जावेगी? यह बड़ी ही मूर्खता और जंगलीपन की बात है॥१६५॥

१६६. और जब कि आसमान फट जावे॥ और जब तारे झड़ जावें॥ और जब दरिया चीरे जावें और जब क़ब्रें जिला कर उठाई जावें॥

—मं॰ ७। सि॰ ३०। सू॰ ८२। आ॰ १।२।३।४॥

समीक्षक—वाह जी क़ुरान के बनाने वाले फ़िलासफ़र! आकाश को क्योंकर फाड़ सकेगा? और तारों को कैसे उड़ा सकेगा? और दर्या क्या लकड़ी है जो चीर डालेगा? और क़ब्रें क्या मुर्दे हैं जो जिला सकेगा? ये सब बातें लड़के के सदृश हैं॥१६६॥

१६७. क़सम है आसमान बुर्जों वाले की॥ किन्तु वह क़ुरान है बड़ा॥ बीच लौह रक्षा के॥                  —मं॰ ७। सि॰ ३०। सू॰ ८५। आ॰ १।२१।२२॥

समीक्षक—इस क़ुरान के बनाने वाले ने भूगोल खगोल भी नहीं पढ़ा था, नहीं तो आकाश को क़िले के समान बुर्जों वाला क्यों कहता! यदि मेषादि राशियों को बुर्ज कहते हैं, तो अन्य बुर्ज क्यों नहीं? इसलिये यह बुर्ज नहीं हैं, किन्तु सब तारे लोक हैं। क्या वह क़ुरान ख़ुदा के पास है? यदि यह क़ुरान उस का किया है, तो वह भी इससे अधिक विद्या और युक्ति से विरुद्ध होकर अविद्या से भरा होगा॥१६७॥

१६८. निश्चय वे मकर करते हैं एक मकर॥ और मैं भी मकर करता हूं एक मकर॥                       —मं॰ ७। सि॰ ३०। सू॰ ८६। आ॰ १५।१६॥

समीक्षक—मकर कहते हैं ठगपन को, क्या ख़ुदा भी ठग है? और क्या चोरी का जवाब चोरी और झूठ का जवाब झूठ है? क्या कोई चोर भले आदमी के घर में चोरी करे, तो क्या भले आदमी को चाहिये कि उस के घर में जा के चोरी करे?॥१६८॥

१६९. और जब आवेगा मालिक तेरा और फ़रिश्ते पंक्ति बांध के॥ और लाया जावेगा उस दिन दोज़ख़ को॥

—मं॰ ७। सि॰ ३०। सू॰ ८९। आ॰ २२।२३॥

समीक्षक—कहो जी! जैसे कोटवाल वा सेनाध्यक्ष अपनी सेना को लेकर पंक्ति बांध फिरा करे वैसा ही इन का ख़ुदा है। क्या दोज़ख़ को[ई] घड़ा सा है कि जिस को उठाके जहाँ चाहे वहाँ ले जावें। यदि इतना छोटा है तो असंख्य क़ैदी उस में कैसे समा सकेंगे?॥१६९॥

१७०. बस कहा था वास्ते उन के पैग़म्बर ख़ुदा के ने, रक्षा करो ऊंटनी ख़ुदा की को, और पानी पिलाना उसके को॥ बस झुठलाया उस को, बस पांव काटे उस के, बस मरी डाली ऊपर उन के, रब उनके ने॥

—मं॰ ७। सि॰ ३०। सू॰ ९१। आ॰ १३।१४॥

समीक्षक—क्या ख़ुदा भी ऊंटनी पर चढ़ के सैल किया करता है? नहीं तो किसलिये रक्खी और विना क़यामत के अपना नियम तोड़ उन पर मरी रोग क्यों डाला? यदि डाला तो उन को दण्ड किया, फिर कयामत की रात में न्याय और उस रात का होना झूठ समझा जायगा? इस ऊंटनी के लेख से यह अनुमान होता है कि अरब देश में ऊंट, ऊंटनी के सिवाय दूसरी कोई सवारी नहीं होती हैं। इसीलिए किसी अरब देशी ने क़ुरान बनाया है॥१७०॥

१७१. यों जो न रुकेगा अवश्य घसीटेंगे साथ बालों माथे के॥ वह माथा, कि झूठा है और अपराधी॥ हम बुलावेंगे फ़रिश्ते दोज़ख़ को॥

—मं॰ ७। सि॰ ३०। सू॰ ९६। [आ॰ १५।१६।१८॥]

समीक्षक—यह नीच, चपरासियों का काम, घसीटने से भी ख़ुदा न बचा। भला माथा भी कभी झूठा और अपराधी हो सकता है? सिवाय जीव के, भला यह भी कभी ख़ुदा हो सकता है कि जैसे जेलखाने के दरोगा को जिले का हाक़िम बुलावा भेजे॥१७१॥

१७२. निश्चय उतारा हम ने कुरान को बीच रात क़द्र के॥ और क्या जाने तू क्या है रात क़द्र की?॥ उतरते हैं फ़रिश्ते और पवित्रात्मा बीच उस के, साथ आज्ञा मालिक अपने के, वास्ते हर काम के॥

—मं॰ ७। सि॰ ३०। सू॰ ९७। आ॰ १।२।४॥

समीक्षक—यदि एक ही रात में क़ुरान उतारा तो वह आयत अर्थात् उस समय में उतरी और धीरे-धीरे उतारा यह बात सत्य क्योंकर हो सकेगी? और रात्री अन्धेरी है इस में क्या पूछना है? वहाँ लिख आये हैं ऊपर नीचे कुछ भी नहीं हो सकता और यहां लिखते हैं कि फ़रिश्ते और पवित्रात्मा ख़ुदा के हुक्म से संसार का प्रबंध करने के लिये आते हैं। इस से स्पष्ट हुआ कि ख़ुदा मनुष्यवत् एकदेशी है। अब तक देखा था कि खुदा फ़रिश्ते और पैग़म्बर तीन की कथा है, अब एक पवित्रात्मा चौथा निकल पड़ा? अब न जाने यह चौथा पवित्रात्मा क्या है? यह तो ईसाइयों के मत अर्थात् पिता, पुत्र और पवित्रात्मा तीन के मानने से चौथा भी बढ़ गया। यदि कहें कि हम इन तीनों को ख़ुदा नहीं मानते, ऐसा भी हो, परन्तु जब पवित्रात्मा पृथक् है तो ख़ुदा फ़रिश्ते और पैग़म्बर को पवित्रात्मा कहना चाहिए वा नहीं? यदि पवित्रात्मा हैं, तो एक ही का नाम पवित्रात्मा क्यों? और घोड़े आदि जानवर, रात दिन और क़ुरान आदि की ख़ुदा क़समें खाता है, क़समें खाना भले लोगों का काम नहीं॥१७२॥

अब इस क़ुरान के विषय को लिख के बुद्धिमानों के सन्मुख स्थापित करता हूं कि यह पुस्तक कैसा है? मुझ से पूछो तो यह किताब न ईश्वर, न विद्वान् और न विद्या की हो सकती है। यह तो बहुत थोड़ा सा दोष प्रकट किया, इसलिये कि लोग धोखे में पड़ कर अपना जन्म व्यर्थ न गमावें। जो कुछ थोड़ा सा इसमें सत्य है वह वेदादि विद्या पुस्तकों के अनुकूल होने से जैसे मुझ को ग्राह्य है, वैसे अन्य भी मज़हब के हठ और पक्षपात रहित विद्वानों और बुद्धिमानों को ग्राह्य है। इस के विना जो कुछ इस में है वह सब अविद्या भ्रमजाल और मनुष्य के आत्मा को पशुवत् बना कर, शान्तिभङ्ग करा के, उपद्रव मचा, मनुष्यों में विद्रोह फैला, परस्पर दुःखोन्नति करने वाला विषय है। और पुनरुक्त दोष का तो क़ुरान जानो भंडार ही है। परमात्मा सब मनुष्यों पर कृपा करे कि सब की प्रीति, परस्पर मेल और एक दूसरे के सुख की उन्नति करने में प्रवृत्त हों। जैसे मैं अपना वा दूसरे मतमतान्तरों का दोष पक्षपात रहित हो कर प्रकाशित करता हूं, इसी प्रकार यदि सब विद्वान् लोग करें, तो क्या कठिनता है कि परस्पर का विरोध छूट, मेल हो कर आनन्द में ऐक्य मत हो के, सत्य की प्राप्ति सिद्ध न हो। यह थोड़ा क़ुरान के विषय में लिखा, इस को बुद्धिमान् धार्मिक लोग ग्रन्थकार के अभिप्राय को समझ लाभ लेवें। यदि कहीं भ्रम से अन्यथा लिख गया हो तो उस को शुद्ध कर लेवें।

अब एक बात यह शेष है कि बहुत से मुसलमान ऐसा कहा करते और लिखा वा छपवाया करते हैं “हमारे मज़हब की बात अथर्ववेद में लिखी हैं।” इस का यह उत्तर है कि अथर्ववेद में इस बात का नाम निशान भी नहीं है।

प्रश्न—क्या तुमने सब अथर्ववेद देखा है? यदि देखा होता तो अल्लोपनिषद् देखो! यह साक्षात् उस में लिखी है; क्यों कहते [हो] कि अथर्ववेद में मुसलमानों का नाम निशान भी नहीं है।

अथाल्लोपनिषदं व्याख्यास्यामः

अस्माल्लां इल्ले मित्रावरुणा दिव्यानि धत्ते।

इल्लल्ले वरुणो राजा पुनर्द्ददुः।

हया मित्रो इल्लां इल्लल्ले इल्लां वरुणो मित्रस्तेजस्कामः॥१॥

होतारमिन्द्रो होतारमिन्द्र महासुरिन्द्राः।

अल्लो ज्येष्ठं श्रेष्ठं परमं पूर्णं ब्रह्माणं अल्लाम्॥२॥

अल्लोरसूलमहामदरकबरस्य अल्लो अल्लाम्॥३॥

आदल्लाबूकमेककम्॥ अल्लाबूक निखातकम्॥४॥

अल्लो यज्ञेन हुतहुत्वा। अल्ला सूर्य्यचन्द्रसर्वनक्षत्राः॥५॥

अल्ला ऋषीणां सर्वदिव्यां इन्द्राय पूर्वं माया परममन्तरिक्षाः॥६॥

अल्लः पृथिव्या अन्तरिक्षं विश्वरूपम्॥७॥

इल्लां कबर इल्लां कबर इल्लां इल्लल्लेति इल्लल्लाः॥८॥

ओम् अल्लाइल्लल्ला अनादिस्वरूपाय अथर्वणाश्यामा हुं ह्रीं जनानपशूनसिद्धान् जलचरान् अदृष्टं कुरु कुरु फट्॥९॥

असुरसंहारिणी हुं ह्रीं अल्लोरसूलमहमदरकबरस्य अल्लो अल्लाम् इल्लल्लेति इल्लल्लाः॥१०॥

इत्यल्लोपनिषत् समाप्ता॥

जो इस में प्रत्यक्ष मुहम्मद साहब रसूल लिखा है इस से सिद्ध होता है कि मुसलमानों का मत वेदमूलक है।

उत्तर—यदि तुमने अथर्ववेद न देखा हो, तो हमारे पास आओ! आदि से पूर्त्ति तक देखो। अथवा जिस किसी अथर्ववेदी के पास बीस काण्डयुक्त मन्त्रसंहिता अथर्ववेद को देख लो। कहीं तुम्हारे पैग़म्बर साहब का नाम वा मत का निशान न देखोगे! और जो यह अल्लोपनिषद् है वह न अथर्ववेद में, न उस के गोपथ ब्राह्मण में है वा किसी शाखा में है। यह तो अकबरशाह के समय में अनुमान है कि किसी ने बनाई है। इस का बनाने वाला कुछ अरबी और कुछ संस्कृत भी पढ़ा हुआ दीखता है क्योंकि इस में अरबी और संस्कृत के पद लिखे हुए दीखते हैं। देखो! अस्मल्लां इल्ले मित्रा वरुणा दिव्यानि धत्ते इत्यादि में जो कि दश अङ्क में लिखा है जैसे—इस में अस्मल्लां और इल्ले अरबी और मित्रा वरुणा दिव्यानि धत्ते यह संस्कृत पद लिखे हैं वैसे ही सर्वत्र देखने में आने से किसी संस्कृत, अरबी के पढ़े हुए ने बनाई है। यदि इस का अर्थ देखा जाता है तो भी यह कृत्रिम, अयुक्त, वेद और व्याकरण-रीति से विरुद्ध सिद्ध होती है। जैसी यह उपनिषद् बनाई है, वैसी बहुत सी उपनिषदें मतमतान्तरवाले पक्षपातियों ने बना ली हैं। जैसी स्वरूपोपनिषद्, नृसिंहतापनी, रामतापनी, गोपालतापनी बहुत सी बना ली हैं।

प्रश्न—आज तक किसी ने ऐसा नहीं कहा, अब तुम कहते हो, हम तुम्हारी बात सच कैसे मानें?

उत्तर—तुम्हारे मानने वा न मानने से हमारी बात झूठ नहीं हो सकती। हां! जिस प्रकार से मैंने इसको अयुक्त ठहराई है, उसी प्रकार से जब तुम अथर्ववेद, गोपथ वा इस की शाखाओं के प्राचीन लिखित पुस्तकों में जैसा का तैसा लेख दिखलाओ और अर्थसंगति से भी शुद्ध करो, तब तो सप्रमाण हो सकती है।

प्रश्न—देखो! हमारा मत कैसा अच्छा है कि जिस में सब प्रकार का सुख और अन्त में मुक्ति होती है।

उत्तर—ऐसे ही अपने-अपने मत वाले सब कहते हैं कि हमारा ही मत अच्छा है, बाक़ी सब बुरे। विना हमारे मत के दूसरे मत से मुक्ति नहीं हो सकती। अब हम तुम्हारी बात को सच्ची मानें वा उनकी? हम तो यही मानते हैं कि सत्यभाषण, अहिंसा, दया आदि शुभगुण सब मतों में अच्छे हैं और बाक़ी वाद, विवाद, ईर्ष्या, द्वेष, मिथ्याभाषणादि कर्म सब मतों में बुरे हैं। यदि तुमको सत्य मत ग्रहण की इच्छा हो, तो वैदिक मत को ग्रहण करो।

इस के आगे स्वमन्तव्याऽमन्तव्य का प्रकाश संक्षेप से लिखा जायगा।

इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिकृते सत्यार्थप्रकाशे

सुभाषाविभूषिते यवनमतविषये

चतुर्दशःसमुल्लासः सम्पूर्णः॥१४॥